मायावती: गठबंधन के सहारे ‘मिशन-30’ की तैयारी ?

राजनीति में किसी को खपा हुआ मान लेना जल्दबाजी हो सकती है. मायावती के लिए ये बात सही इसलिए भी है क्योंकि राजनीति में नीचे जाने के बाद भी उनका वोटबैंक सुरक्षित रहा है. बसपा के कोर वोटर ने मायावती का साथ कभी नहीं छोड़ा. यही कारण है कि गठबंधन में मायावती अखिलेश यादव यादव से समझौता करने में कतई नहीं झुकीं.

सपा-बसपा की साझा प्रेस कॉन्फ्रैस से लेकर मायावती के जन्मदिन तक जो जश्न और जो तस्वीरें दिखाई दीं उसने एक बात तो स्पष्ट कर दी की आने वाले समय में मायावती अपने लिए बड़ी संभावना देख रह हैं. उपप्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति देश के इन तीन बड़ों पदों पर मायावती पहुंच सकती है. मौजूदा समीकरण के हिसाब से अगर बसपा 30 सीटें जीतने में कामयाब हो गई तो मायावती के भविष्य में चार चांद लग सकते हैं. अपने 63वें जन्मदिन पर मायावती ने 63 किलो का केक काटते हुए कहा कि सपा-बसपा गठबंधन का जिक्र करते हुए कहा कि इससे सभी विरोधियों की नींद उड़ी हुई है. उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहा है कि वो पुराने मतभेद भुलाकर गठबंधन प्रत्याशियों को जिताएं.

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4 बार यूपी की सीएम रह चुकीं माया जानती हैं कि 2014 के बाद बसपा का यूपी में सूपड़ा लगभग साफ ही हो गया है. 2017 के विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी सिर्फ 19 सीटें जीत पाई. अब उम्मीद ये कर रही हैं मायावती की अखिलेश यादव की सपा के साथ गठबंधन से जो समीकरण बने हैं वो उन्हें सत्ता के शीर्ष पर पहुंचा सकती है. मायावती ये भी सोच रही हैं कि यूपी के बाहर भी उनकी पार्टी कुछ सीटें जीत सकती है. गणित ये है कि बसपा अगर 30 या उससे ज्यादा सीटें जीतती है तो मायावती नाम सिर्फ मजबूत होंगे बल्कि सत्ता केलिए महत्वपूर्ण भी हो जाएंगी.

अभी तृणमूल कांग्रेस के 34 सांसद हैं लेकिन आगामी लोकसभा चुनाव में ये कम हो सकते हैं क्योंकि पश्चिम बंगाल में बीजेपी तेजी से पैर पसार रही है. तमिलनाडु में एआईएडीएमके और डीएमके में  बराबर की टक्कर है ऐसे में ये कहा जा सकता है कि अगर मायावती मिशन 30 में कामयाब हो गईं तो बसपा तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभर सकती है. क्योंकि कांग्रेस और बीजेपी की टक्कर में कांग्रेस 120 से 130 सीटें जीतती दिखाई दे रही है ऐसे में गैर बीजेपी और गैर कांग्रेस प्रधानमंत्री की संभावना अगर बनती है तो माया वहां खुद को देखना चाहती हैं. इसके अलावा मायावती का दलित और महिला होना भी उनके पक्ष में जा सकता है.

एक और समीकरण ये दिखाई दे रहा है कि अगर एनडीए को पूर्ण बहुमत नहीं मिलता है तो मायावती को उप प्रधानमंत्री पद का ऑफर भी दिया जा सकता है. अभी भले ही मायावती बीजेपी पर बरस रही हों लेकिन आने वाले समय में कुछ भी हो सकता है. क्योंकि 1993 के बाद देश ने ये देखा है कि बसपा सपा के साथ चुनाव लड़ी और बीजेपी के साथ बाद में चली गई. एक और समीकरण ये है कि मायावती भले ही कांग्रेस पर क्रोधित दिखाई देती होंगे लेकिन उन्होंने कांग्रेस के लिए दो सीटों पर चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया है.

तीसरी संभावना ये है कि अगर मायावती के समर्थन से केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनी तो 2022 में उन्हें राष्ट्रपति बनाने का प्रस्ताव भी मिल सकता है. बीजेपी भी उन्हें ये प्रस्ताव दे सकती है. 2022 में मायावती 66 साल की होंगी यूपी के चुनाव हो चुके होंगे और अगर वो राष्ट्रपति बनती हैं तो वो 2027 तक इस पद रहेंगे और उनके भतीजे आकाश जो आजकल उनके साथ साए के साथ रहते हैं वो बसपा संभालेंगे. कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि मायावती के लिए 2019 का चुनाव बहुत महत्वपूर्ण है और अगर वो मिशन-30 में कामयाब रहीं तो फिर उनके लिए संभावनाओं के द्वार खुल जाएंगे.

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