ऑटोमेटेड खेती भारत में संभव है क्या ?

लोगों की जरूरतें बढ़ रही हैं. आबादी बढ़ रही है और इस आबादी का पेट भरने के लिए खाना कहां से आएगा ये बड़ा सवाल है. भारत में बढ़ती आबादी और कृषि की बदतर होती हालत की वजह से सरकारें इस दिशा में सोच रही हैं. लेकिन ये बड़ी चुनौती है. कि इससे कैसे निपटा जाए. चीन ने अपनी आबादी की जरूरत और किसानों की समस्या को खत्म करने के लिए खेतों तक ऑटोमेशन पहुंचाने का काम किया है.

चीन ये मानता है कि कृषि में भविष्य ऑटोमेशन का है. मशीनों से होने वाली कृषि को बढ़ावा देने के लिए चीन तेजी से काम कर रहा है. चीनी प्रशासन बिना ड्राइवर के फसल काटने वाली मशीनें बनाने की तैयारी कर रहा है. पूर्वी चीन के जिन्हुआ में ऐसी ही एक मशीन खेत में तेजी से चावल काट रही है. चीनी सरकार ने कई कंपनियों से कहा है कि आने वाले 6 या 7 सालों में उन्हें ऐसी ऑटोमेटेड मशीनें चाहिए. चीन ये इसलिए भी कर रहा है क्योंकि चीन की बड़ी आबादी बूढ़ी हो गई है और भोजन की जरूरतों को पूरा करने के लिए गांव में उसके पास कामगार नहीं बचे हैं.

ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में तो ऐसी मशीनों का इस्तेमाला कृषि के लिए हो रहा है. 7 साल की योजना को पूरा करने के लिए बीजिंग स्थानीय टेक्नोलॉजी को मदद कर रहा है. टेलीमैटिक्स इंडस्ट्रीज ऐप्लिकेशन अलायंस के माध्यम से प्रयोग किए जा रहे हैं. चीन में 2017 में ही बिना ड्राइवर वाला ट्रेक्टर आ गया था लेकिन आने वाले सालों में ये तादाद बढ़ाई जाएगी. चीन ‘बेइदो’ उपग्रह नेविगेशन सिस्टम के माध्यम से ये काम करना चाहता है. अमेरिकी ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम भी ऐसे ही काम करता है. बीजिंग ने अपनी “मेड इन चाइना 2025” योजना में खेती में काम आने वाली मशीनों को भी रखा है.

2025 तक चीन कृषि में क्रांतिकारी बदलाव लाने की कोशिश कर रहा है. अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया खेती में इस तरह के कई प्रयोग कर रहा है और कामयाब भी है लेकिन वहां ये इसलिए संभव है क्योंकि वहां पर खेत बड़े बड़े हैं. वहां 90 फीसदी खेल पांच हेक्टरेयर से बड़े हैं लेकिन चीन और भारत में ये 90 फीसदी खेत 1 हैक्टैयर से कम हैं. लिहाजा छोटे खेतों में ये मुश्किल हैं कि ऑटोमेशन किया जा सके. एक और बड़ी समस्या ये है कि इसकी कीमत ऑटोमेटेड मशीने महंगी हैं यानी एक बिना ड्राइवर का ट्रैक्टर 64 लाख का है और ऐसे में भारत में तो इस तरह की कृषि दूर की कौड़ी है.

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