Dolo 650 खरीदने से पहले आपको यह भी पढ़ना चाहिए! आंखें खोल देगा

Dolo 650 के रहस्यमई कारोबार को लेकर इस वक्त भारत में बहस छिड़ी हुई है सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर टिप्पणी की है. क्या है इसके पीछे की पूरी कहानी आइए जानते हैं.

ऐ आसमान तेरे ख़ुदा का नहीं है ख़ौफ़
डरते हैं ऐ ज़मीन तिरे आदमी से हम
यह शेर किसने लिखा, पता नहीं, मगर जिसने भी लिखा, क्या खूब लिखा…….

आज के मुद्दे पर आने से पहले आइए समझते हैं भारतीय दवा कारोबार के विस्तार को

Business strategy of Dolo 650 and other medicine

विश्व में अलग-अलग बीमारियों के 50% टीकों की माँग भारत से पूरी होती है….. अमेरिका में सामान्य दवाओं की माँग का 40% और ब्रिटेन की कुल दवाओं की 25% आपूर्ति भारत में निर्मित दवाओं से ही होती है….. इसके अलावा विश्व भर में एड्स जैसी खतरनाक बीमारी के लिये प्रयोग की जाने वाली एंटी-रेट्रोवायरल दवाओं की 80% आपूर्ति भारतीय दवा कंपनियाँ ही करती हैं…. इंडिया ब्रांड इक्विटी फाउंडेशन (India Brand Equity Foundation) की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2017 में भारतीय फार्मा उद्योग का कुल मूल्य लगभग 33 अरब अमेरिकी डॉलर था…. वर्ष 2017 में ही भारतीय दवा उद्योग का घरेलू कारोबार 18.87 अरब अमेरिकी डॉलर का था…. वर्ष 2018 में भारतीय दवा उद्योग के घरेलू कारोबार में 9.4% की वृद्धि दर्ज़ की गई… वर्ष 2015 से 2020 के बीच भारतीय दवा उद्योग में 22.4% की वृद्धि हुई है…. एक अनुमान के अनुसार वर्तमान में भारतीय दवा उद्योग का कारोबार 40 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक है और अगले 5 वर्षों में यह कारोबार 120-150 बिलियन डॉलर तक पहुँच जाएगा…

मी लॉर्ड,
यह तो था असली दवा कारोबार का लेखा जोखा…..
मगर क्या आप जानते हैं…..
जायकेदार और पेट भरने वाली रेवड़ियां अर्थात फ्रीबीज तो इसी कारोबार में बंटती हैं…. और यहां लाभार्थी तबका है धरती के भगवान कहे जाने वाले डॉक्टरों का….. पूरा माजरा एक उदाहरण से समझिए….
एंटीबायोटिक सिप्रोफिलाक्सिन 500 एमजी की दस गोलियों की स्टिप पर 64 रुपए प्रिटं रेट है…. लेकिन थोक मार्केट में यह 10 रुपये की है…. दवा कंपनी को इसकी लागत पांच रुपये ही पड़ती है….. इससे चाहे तो आप दवा कारोबार में कमाई की नब्ज टटोल सकते हैं…..

आई बात समझ में…. सोचिए, जब इतना मालामाल होने की गुंजाइश है इस कारोबार में तो जाहिर है…. कालाबाजारी भी होगी…..

कोरोना महामारी के दौरान एंटीवायरल दवा रेमडेसिविर की किल्लत के बीच कालाबाजारी कर बहुतेरे मालामाल हो गये….. OLX पर 6-6 हजार रुपये में बिकी यह दवा…. मध्य प्रदेश एसटीएफ ने कोरोना मरीजों के इलाज में इस्तेमाल होने वाले रेमडेसिविर इंजेक्शन के ब्लैक मार्केटिंग में मेडिकल शॉप मालिक समेत तीन लोगों को गिरफ्तार किया था… उन पर आरोप था कि रेमडेसिविर इंजेक्शन को बीस-बीस हजार रुपये में बेचने की कोशिश कर रहे थे….

नागपुर दो ऐसे व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया…. जो कोविड वायरस संक्रमित एक मरीज के परिजन को 40 हजार रुपये में रेमडेसिविर का एक इंजेक्शन बेच रहे थे….. विडम्बना यह है कि वे रेमडेसिविर इंजेक्शन की शीशी में पानी भरकर बेच रहे थे.

मध्यप्रदेश पुलिस ने गुजरात से महीने भर के भीतर कम से कम 1,200 नकली रेमडेसिविर इंजेक्शन लाए जाने का खुलासा किया था….

ऑथेंटिकेशन सॉल्यूशंस प्रोवाइडर्स एसोसिएशन (ASPA) की माने तो, साल 2020 की तुलना में 2021 में घटिया क्वालिटी वाले और नकली मेडिकल उत्पादों के मामले 47 फीसदी बढ़ गए….. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि नकली दवाओं के जो मामले सामने आए…. उनमें से ज्यादातर कोविड-19 से संबंधित रहे…. इनमें वैक्सीन, दवाएं, कोविड टेस्ट किट, एंटीबॉयोटिक, फेस मास्क और सेनेटाइजर आदि शामिल रहे….

जो जानकारियां यहां दी गई हैं…. कोई गुप्त ज्ञान नहीं है…. मीडिया ने समय समय पर इनका खुलासा किया है…. इससे आपको दवा कारोबार की तासीर समझने में मदद मिलेगी….

अब आइए मुद्दे की बात पर

बुखार के इलाज के लिए Dolo 650 मिलीग्राम का नुस्खा लिखने के लिए डॉक्टरों को 1000 करोड़ रुपये के मुफ्त उपहार बांटे गए….
गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में एक एनजीओ ने बताया कि केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) ने डोलो टैबलेट बनाने वाली चर्चित फार्मा कंपनी पर यह आरोप लगाया है….
गौर कीजिएगा, डॉक्टरों ने इस उपकार के बदले में Dolo 650 भारतीयों के पसंदीदा स्नैक्स में तब्दील कर दिया….
डोलो-650 के 15 टैबलेट वाले एक पत्ते की कीमत करीब 31 रुपये है. इसके बाद भी डोलो-650 ने माइक्रो लैब्स को रिकॉर्डतोड़ कमाई करा दी. कोरोना महामारी के दौरान इसकी बिक्री में इस कदर उछाल आया कि यह बाजार से गायब हो गई थी. साल 2020 में कोविड-19 महामारी की शुरुआत होने के बाद Dolo 650 के 350 करोड़ टैबलेट बिक गए थे. कंपनी ने कोरोना काल में सिर्फ डोलो-650 की ही 567 करोड़ रुपये की बिक्री कर दी थी.

साल 1973 में जीसी सुराना ने दवा कंपनी माइक्रो लैब्स लिमिटेड की शुरुआत की
इस कंपनी में अभी करीब 9,200 कर्मचारी काम करते हैं.
कंपनी का सालाना टर्नओवर पिछले साल 2,700 करोड़ रुपये रहा था, जिसमें 920 करोड़ रुपये का एक्सपोर्ट भी शामिल है.
कंपनी करीब 50 देशों को अपनी दवाएं एक्सपोर्ट करती है.
माइक्रो लैब्स लिमिटेड की सफलता में सबसे ज्यादा योगदान Dolo 650 का ही है.
दरअसल पैरासिटामोल बनाने वाली अन्य कंपनियां 500 एमजी वाले फॉर्मूलेशन ही बनाती हैं.
डोलो बुखार की अकेली दवा है, जो 650 एमजी में भी आती है.
बाजार में उपलब्ध पैरासिटामोल दवा के अन्य लोक्रपिय ब्रांडों में क्रोसिन, पैरासिप, कालपोल, सुमो आदि की गिनती होती है. हालांकि कोरोना काल में Dolo 650 ने सभी अन्य ब्रांडों को मीलों पीछे छोड़ दिया था.

याचिकाकर्ता ‘फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारिख और अधिवक्ता अपर्णा भट की माने तो 500 मिलीग्राम तक के किसी भी टैबलेट का बाजार मूल्य सरकार नियंत्रित करती है….. 500 मिलीग्राम से ऊपर की दवा की कीमत संबंधित फार्मा कंपनी तय करती है…
अब आपको इस कारोबार का झोल समझ में आ रहा होगा…
सुप्रीम कोर्ट ने इस आरोप को ‘गंभीर मुद्दा’ करार दिया…. जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, ‘आप जो कह रहे हैं वह सुनने में सुखद लगता है….. यही दवा है, जो उन्होंने कोविड होने पर ली थी….. यह एक गंभीर मुद्दा है और वे इस पर गौर करेंगे.’
पीठ ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज को दस दिनों में याचिका पर अपना जवाब दाखिल करने को कहा

इसके बाद पारिख को अपना जवाब दाखिल करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया गया. न्यायालय ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 29 सितंबर की तारीख मुकर्रर की है.


आपकी जानकारी के लिए बता दें कि आयकर विभाग ने छह जुलाई को बेंगलुरु की माइक्रो लैब्स लिमिटेड के नौ राज्यों में स्थित 36 परिसरों पर छापेमारी के बाद यह दावा किया था. दवा कंपनियां इस तरह की गतिविधि को ‘सेल्स प्रमोशन’ बताती हैं…. सच्चाई यह है कि दवाओं की बिक्री में बढ़ोतरी के बदले डॉक्टरों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष लाभ…. मसलन उपहार, मनोरंजन, प्रायोजित विदेश यात्राएं और अन्य लाभ दिए जाते हैं….
जाहिर है इस हथकंडे से कई दूरगामी दु्ष्प्रभाव भी पड़ते हैं…. मसलन डॉक्टर ज्यादा मात्रा में इस दवा के उपयोग को प्रोत्साहित करते होंगे…. जिसका खामियाजा मरीज भुगतते होंगे….

Dolo 650 को लेकर छेड़े विवाद में हमें मजबूर कर दिया है कि हम दवाई के क्षेत्र में काम करने वालों के लिए बनाए गए कानून पर भी गौर करें. भारतीय चिकित्सा परिषद (व्यावसायिक आचरण, शिष्टाचार और नैतिकता) विनियमावली, 2002 में डॉक्टरों के संबंधों के लिए एक आचार संहिता (कोड ऑफ कंडक्ट) निर्धारित है, जो फार्मास्युटिकल कंपनियों द्वारा डॉक्टरों को तोहफे और मनोरंजन, यात्रा सुविधाएं, आतिथ्य, नकद या किसी तरह से धन लेने पर रोक लगाते हैं. मगर‘यह कोड डॉक्टरों के खिलाफ लागू है, पर यह दवा कंपनियों पर लागू नहीं होता है, जिसके कारण ऐसी विषम स्थिति पैदा होती हैं, जहां उस कदाचार, जो फार्मा कंपनियों द्वारा प्रोत्साहित किया जा रहा है, के लिए डॉक्टरों के लाइसेंस रद्द कर दिए जाते हैं. फार्मा कंपनियां बेदाग निकल जाती हैं.’

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