तमिलनाडु: सियासी शून्यता से जूझते राज्य में ‘गठबंधन’ की भूमिका किनती अहम है ?

आगामी लोकसभा चुनाव में बीजेपी उत्तर भारत में होने वाली सीटों के नुकसान की भरपाई करने के लिए पूर्वोत्तर और दक्षिण के राज्यों में अपनी गोटियां बिछा रही है. इसी के तहत BJP ने अब तमिलनाडु में सत्ताधारी AIADMK के साथ गठबंधन किया है.

जयललिता के निधन के बाद AIADMK काफी उथलपुथल से गुजरी है. आगामी चुनाव में उसके सामने भी चुनौती बड़ी है और दोनों दल एक दूसरे से फायदा लेना चाहते हैं.

AIADMK ने 14 फरवरी को PMK के साथ गठबंधन किया था और अब BJP के साथ डील डन हुई है. आगामी चुनाव में पुडुचेरी को मिलाकर राज्य की 40 सीटों में से 7 पर PMK और 5 पर BJP चुनाव लड़ेगी. AIADMK कितनी सीटों पर लड़ेगी ये तय नहीं है क्योंकि इस गठबंधन के लिए और भी साथियों को तलाशा जा रहा है.

जयललिता के निधन के बाद राज्य में सत्ताधारी AIADMK से लोग नाराज भी हैं और लोग सत्ता परिवर्तन चाहते हैं. उधर DMK भी लगातार सरकार को घेर रही है और DMK कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ने वाली है. कांग्रेस की बात करें तो राज्य में 1967 के चुनाव में हार के बाद पार्टी का ढांचा लगातार कमजोर होता गया है.

ये चुनाव ऐसे वक्त में हो रहा है जब राज्य के दो बड़े नेताओं के निधन के बाद एक राजनीतिक शून्यता और गई है. AIADMK के पास कोई नेता नहीं है. DMK के नेता स्टालिन को खुद को साबित करना है. बीजेपी और कांग्रेस ऐसे में तीसरा विकल्प बनना चाहती हैं. जो आसान तो कतई नहीं है. लेकिन बड़ा प्रश्न ये है कि बीजेपी क्या इस सियासी शून्यता को फायदा ऊठा पाएगी.

तमिलनाडु में कांग्रेस का आना मुश्किल है क्योंकि द्रविड़ पार्टियों के पास अब भी 60-70% समर्थन है. ये अभी कुछ समय तक कम नहीं होगा और बीजेपी इन्हें ज़िंदा रखेगी. बीजेपी हिंदी और संस्कृत थोपने की कोशिश कर रही है, और यहां के लोगों को ये पसंद नहीं है.

कामराज सरकार के बाद से कांग्रेस पार्टी सत्ता में नहीं आई है. दोनों द्रविड़ दल, तमिलनाडु राजनीतिक मंच पर शक्तिशाली हैं और प्रदेश कांग्रेस और बीजेपी  में कोई प्रमुख नेता नहीं है. कांग्रेस की योजनाओं के बारे में बताने के लिए राज्य में कोई मज़बूत टीम नहीं है ऐसे में दिलचस्प ये है कि मोदी ये मौका कैसे भुनाते हैं.

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