मायावती: ‘गठबंधन’ के ‘गेस्ट हाउस’ को क्यों भुला दिया ?

आम धारणा है कि राजनीति में कोई स्थायी दोस्त या स्थायी दुश्मन नहीं होता. लेकिन जब लालू-नीतीश, अखिलेश-माया, अखिलेश-राहुल जैसे नेता साथ आते हैं तो एक नई धारणा बनती है. धारणा ये कि राजनीति में नफा-नुकसान तय करता है कि दुश्मनी कितनी और कब तक की जाए ?

यूपी में मौजूदा राजनीतिक समीकरणों की बात करें तो सपा-बसपा और कांग्रेस ने अपने-अपने हितों को ध्यान में रखकर बिसात बिछाई है. एतिहासिक गठबंधन हुआ है, कांग्रेस पार्टी ने 20 साल बाद एक बड़ा फैसला लेते हुए प्रियंका को सक्रिय राजनीति में उतारा है. कांग्रेस और मायावती के लिए ये चुनाव बेहद अहम क्योंकि दोनों ही पार्टियां अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं.

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2014 के लोकसभा चुनाव में खाता भी नहीं खोल पाई बसपा ने 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में सिर्फ 19 सीटें जीती थीं. यानी 2019 का चुनाव मायावती के लिए करो या मरो वाला है और इसलिए उन्हें गेस्ट हाउस को भुलाना ही मुनासिब समझा. उन्हें पता है जिस गठबंधन पॉलिटिक्स ने उन्हें चार बार देश के सबसे महत्वपूर्ण सूबों में शुमार यूपी का मुखिया बनाने में मदद की वही उनका बेड़ा पार कर सकती है.

मायावती यूपी के मौजूदा नेताओं में पहली पांत की नेता हैं. और आकंड़े बताते हैं कि बसपा को हमेशा गठबंधन से फायदा हुआ है. 1990 में जब कांग्रेस का यूपी में जानाधार सिमट रहा था तो बसपा ने कांग्रेस पारंपरिक दलित वोट बैंक को कांग्रेस से छीन लिया. गठबंधन चांहे बीजेपी के साथ हो, कांग्रेस के साथ हो या फिर सपा के साथ बसपा हमेशा फायदे में रही.

2017 में बसपा ने 19 सीटें और सपा ने 47 सीटें जीती थीं, 2014 के लोकसभा चुनाव में सपा ने 5 और बसपा ने एक भी सीट नहीं जीती थी. मायावती जानती थीं कि ये चुनाव उनके लिए आखिरी मौका है और 1993 की एक बार फिर सपा से गठबंधन उन्हें हाशिये पर जाने से बचा सकता है. क्योंकि जब भी बसपा ने गठबंधन किया उसकी सीटें भी बढ़ीं और उसका वोट प्रतिशत ऊपर गया.

1996 में बसपा ने कांग्रेस से हाथ मिलाया 67 सीटें जीतीं, कांग्रेस को 33 सीटें मिलीं, यूपी में 2002 में 98, 2007 में 2006, 2012 में 80 सीटें मायावती ने जीतीं. गठबंधन का सिलसिला 1992 के बाद शुरू हुआ जब 1992 में बीजेपी को रोकने के लिए बसपा के तत्कालीन प्रमुख कांशीराम ने 1993 में सपा से हाथ मिलाया और यूपी में गठबंधन की सरकार बनाई

सपा-बसपा का गठंबधन 1995 में गेस्ट हाउस कांड के बाद खत्म हो गया और मायावती ने सपा के साथ कभी न जाने का संकल्प लिया था, बीजेपी के साथ मायावती ने 1995, 1997 और 2002 में गठबंधन किया था और हर बार बसपा फायदे में रही. ये वो दौर रहा जब मायावती भाजपा का साथ लेकर ऊपर गईं और 1996 में बीजेपी 174 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी रही भाजपा 2002 में 88, 2007 में 51 और 2012 में 47 सीटें ही जीत पाई. बीजेपी का ये सूखा 2017 में जाकर खत्म हुआ जब मोदी असर के कारण उसे यूपी में 312 सीटें मिलीं.

अब मायावती ने नया गठबंधन किया है अखिलेश के साथ. यानी सपा-बसपा सूबे की 65 फीसदी आबादी का प्रतिनिधित्व करती हैं जिसमें 22 फीसदी दलित, 45 फीसदी पिछड़ी जातियां है. सपा-बसपा को एक साथ आने से 44 वोट मिलते हैं. बीजेपी को 40 फीसदी वोट होते हैं.

अब अगर इस आंकड़े से देखें तो बसपा फायद में ही रहेगी. और मायावती एक बार फिर से गठबंधन पॉलिटिक्स की सूरमा बनकर उभरेंगी. क्योंकि गोरखपुर, फूलपुर और कैरान चुनाव के नतीजे बताते हैं कि ये गठबंधन बीजेपी के लिए सूबे में ज्यादा कुछ बचाने वाला है नहीं.

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