राहुल गांधी: ‘पप्पू’ से परिपक्व होने तक…

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‘पार्टी प्रमुख के तौर पर ये लाजिमी है कि मैं केक का वितरण बराबर-बराबर से करें…क्योंकि कभी-कभी लोग पूरा केक ही लेने की फिराक में होते हैं’

कांग्रेस मुख्यालय में133वें स्थापना दिवस पर राहुल गांधी ने जब ये बात कही तो वहां मौजूद लोग ठहाके लगाकर हंसने लगे. राहुल पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की केक काटने में मदद कर रहे थे. 47 साल के राहुल गांधी का ये हल्का फुल्का अंदाज ये बता रहा था कि आने वाले दिनों में वो वरिष्ठ नेताओं को उनके ऊपर दवाब डालने की इजाजत तो दे सकते हैं लेकिन कठिन हालातों में बख्शेंगे नहीं. 2018 में राहुल गांधी ने ‘पप्पू’ से परिपक्व होने का सफर तय किया है. इसका बात के संकेत आपको सोशल मीडिया पर भी मिल जाएंगे.

“ट्विटर के सूत्रों का मानना है कि पप्पू हैशटैग का इस्तेमाल पिछले पांच सालों में सबसे कम है और कभी-कभी तो इसका इस्तेमाल फेंकू हैशटैग से भी कम हो रहा है’

ये इस बात का संकेत है राहुल गांधी ने एक लंबा सफर तय किया है. संघ परिवार और बीजेपी ने ही राहुल गांधी का पप्पू कहकर मजाक नहीं बनाया. कांग्रेस के भीतर भी राहुल गांधी को लेकर स्थिति अच्छी नहीं थी. लेकिन 2018 में राहुल गांधी ने अपनी मेहनत से अपने आलोचकों को मुंह तोड़ जवाब दिया है.

राहुल के उभार में काफी वक्त लगा

2018 कांग्रेस अध्यक्ष के लिए उभार का साल रहा है. 2004 में पहला लोकसभा चुनाव जीतने के बाद भले ही शुरुआती 10 साल तक कांग्रेस सत्ता में रही हो लेकिन जो उम्मीद उनसे थी उसपर वो खरे नहीं उतरे. 2014 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी के नाम के साथ पप्पू लग गया. 2014 के बाद भी राहुल गांधी ने कुछ खास नहीं किया. ना ही पार्टी के लिए वो काम आए और न ही विपक्ष के तौर पर उनमें धार दिखी. फिर आया 2017, ये साल राहुल गांधी के करियर का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ. गुजरात चुनाव में राहुल गांधी बदले-बदले नजर आए. राज्य भले न जीते हों लेकिन बीजेपी को बैकफुट पर जरूर पहुंचा दिया. गुजरात चुनाव में राहुल की परिपक्वता ही थी जिसने सोनिया गांधी को ये अहसास कराया कि अभ वो राहुल को कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी सौंप सकती है.

अध्यक्ष की कुर्सी ने कमाल किया

2017 के दिसंबर में राहुल गांधी ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद संभाला था. 2018 में उनकी कई मौकों पर राजनीति सूझबूझ का परिचय दिया. बतौर पार्टी अध्यक्ष पहली बड़ी चुनौती कर्नाटक विधानसभा चुनाव थे. चुनाव में पार्टी हार गई लेकिन राहुल की राजनीति सूझबूझ ने उन्हें सत्ता में बनाए रखा. सिद्धारमैया, बीएस येदियुरप्पा और जनता दल सेकुलर के कुमारास्वामी जैसे नेताओं के बीच राहुल ने राजनीति चातुर्य का प्रदर्शन किया और उसका नतीजा ये हुआ कि बीजेपी सबसे बड़ा दल होते हुए भी विपक्ष में बैठी है. राहुल ने कर्नाटक में सिद्धारमैया और उनके विरोधियों के बीच सुलह कराई, डीके शिवकुमार को भी प्रमुख भूमिका दी.

भाषणों में दिखने लगी है धार

राहुल गांधी पहले अपने भाषणों की वजह से आलोचना झेलते थे. लेकिन बीते कुछ महीनों में उन्होंने धारदार भाषण शैली अपनाई है. अविश्वास प्रस्ताव के दौरान संसद में उनका भाषण हो या फिर देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग विषयों पर दिए गए उनके सार्वजनिक संबोधन. किसानों के मुद्दे पर और रफाल विवाद पर वे बहुत प्रभावी ढंग से पूरे साल मोदी सरकार को घेरते हुए नजर आए. 2018 में तो उन्होंने अपने भाषणों से मोदी पर इतने तीखे हमले किए कि बीजेपी को प्रेस कॉन्फ्रेंस करके पलटवार करना पड़ा. 2018 के आखिरी महीने राहुल गांधी के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हुए.

छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान के चुनावों में और चुनावी नतीजों के बाद के प्रबंधन में. युवा और अनुभव दोनों को साथ रखने में. राहुल हर मौके पर अपने परिपक्वता का परिचय दिया है. अब राहुल गांधी के लिए 2019 नए चैलेंज है जिसमें उन्हें काफी कुछ साबित करना है. अपने लिए उन्होंने जो जमीन तैयार की है वो यकीनन उन्हें फायदा पहुंचाएगी.

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