स्वामी प्रसाद मौर्य और दारा सिंह चौहान ने ऐसे ठोंकी BJP के ताबूत में आखिरी कील ?

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स्वामी प्रसाद मौर्य और दारा सिंह चौहान ने भारतीय जनता पार्टी छोड़ दी उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दिया और आप समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया है. इन दोनों नेताओं के बारे में कहा जाता है कि यह मौसम का मिजाज बहुत जल्दी भांप लेते हैं. क्या यूपी में मौसम बदल गया है और सपा की सरकार बन सकती है?

स्वामी प्रसाद मौर्य और दारा सिंह चौहान को रोकने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने बहुत कोशिश की ऐसा सूत्र बताते हैं. कहा तो यह भी जा रहा है कि दिल्ली से संदेश आया था कि किसी भी तरह से इन दोनों नेताओं को रोका जाए. लेकिन यह हो न सका और दोनों ही नेता अखिलेश यादव के साथ दिखाई दिए. पहले मंगलवार को श्रम मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा देते हुए भारतीय जनता पार्टी से राहें अलग करने के एलान किया था. और अब वन मंत्री दारा सिंह चौहान ने ऐसा किया है क्या है इसके मायने?

उत्तर प्रदेश में बीते कुछ महीनों से नेताओं के पाला बदलने का क्रम जारी है लेकिन विधानसभा चुनाव की तारीखों के एलान के साथ इसमें तेज़ी आई है. ऐसा क्यों हो रहा है और क्या इससे समाजवादी पार्टी को चुनाव में फायदा होगा? कुछ जरूरी सवाल है जिनके जवाब तलाशना जरूरी है. चुनाव के पहले रिएलाइनलमेंट होता है. ये स्वाभाविक है. लेकिन इस समय बीजेपी छोड़कर जाने वालों की संख्या ज़्यादा दिख रही है.मंत्री भी जा रहे हैं.

स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे नेता बीजेपी क्यों छोड़ रहे हैं?

इसकी एक वजह ये हो सकती है कि इन नेताओं को बीजेपी के सत्ता में वापसी की संभावना कम दिख रही हो. बीजेपी ने जिन ग़ैर यादव पिछड़ी जातियों पर डोरे डाले थे, उनका अब मोहभंग हो रहा है. बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व इसे समय पर भांपने में नाकाम रहा. स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे मंत्रियों के जाने से बीजेपी को नुक़सान हो सकता है. बीजेपी भले ही मौर्य को मनाने की कोशिश में जुटी हो लेकिन वो साफ़ कर चुके हैं कि ‘तीर कमान से निकल गया है और अब वो वापस नहीं आएगा. और समाजवादी पार्टी को इसका फायदा मिलेगा क्योंकि ओबीसी जातियां जितनी बीजेपी से कटेंगे उतना उसे नुकसान उठाना पड़ेगा.

सपा से हटेगा यादवों की पार्टी होने का तमगा

बीजेपी ने समाजवादी पार्टी को यादवों की पार्टी डिक्लेयर कर दिया था और काफी हद तक वो ऐसा इंप्रेशन देने में भी कामयाब हुई थी. लेकिन इस बार अखिलेश यादव की रणनीति पिछड़ों को एकजुट करने की है और वो इसमें कामयाब भी हो रहे हैं. (ओपी) राजभर, मौर्य, कुशवाह और सैनी उनसे जुड़े हैं. मल्लाह बहुत हद तक जुड़े हैं. अनुप्रिया पटेल बीजेपी के साथ हैं लेकिन कृष्णा पटेल अखिलेश यादव के साथ हैं. मौर्य पुराने और ज़मीनी नेता हैं. इनके पास अपने समर्थक भी हैं. कुशवाहा, सैनी और कोइरी वर्ग के लोग इनके साथ रहे हैं.

लोअर ओबीसी में सेंध लगा रही है सपा

लोअर ओबीसी बीजेपी को पावर में लाई थी. पावर में शेयर न मिलने से उन्हें लग रहा है कि उन्हें सत्ता में उचित साझेदारी नहीं मिली. ऐसी राय रखने वालों में राजभर हैं, सैनी हैं, मौर्य हैं. यही किसान भी हैं. ग्रामीण इलाकों में बीते छह-सात सालों में जो आर्थिक तबाही हुई है, उसकी धर्म की राजनीति से भरपाई मुमकिन नहीं है. इसलिए अखिलेश यादव की कोशिश कामयाब होती हुई दिखाई दे रही है और स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे नेता इसमें अखिलेश यादव की मदद कर रहे हैं.

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