अखिलेश यादव ने जयंत चौधरी से गठबंधन तो कर लिया लेकिन क्या BJP के पांव उखाड़ पाएंगे?

अखिलेश यादव ने अपने ट्विटर हैंडल से देख तस्वीर साझा की जिसमें वह आरएलडी प्रमुख जयंत चौधरी से हाथ मिलाते हुए दिखाई दे रहे हैं. और इस बात का ऐलान किया कि 2022 का चुनाव दोनों पार्टियां मिलकर लड़ेंगी. लेकिन क्या यह मिलाप बीजेपी के लिए मुश्किलें खड़ी कर पाएगा.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति को करीब से समझने वाले यह बताते हैं कि कृषि कानूनों की वजह से इस इलाके में भारतीय जनता पार्टी को काफी नुकसान हुआ है. और इसीलिए जयंत चौधरी की भूमिका अहम हो गई. लेकिन अब जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कृषि कानून वापस लेने का ऐलान कर दिया है तो क्या जयंत इस इलाके में उतने ही प्रासंगिक अभी भी हैं. क्योंकि अखिलेश यादव ने उनके साथ गठबंधन का ऐलान कर दिया है और 2022 में समाजवादी पार्टी आरएलडी के साथ मिलकर चुनाव लड़ेगी.

2019 के लोकसभा चुनाव में भी दोनों दलों ने गठबंधन में चुनाव लड़ा था. ये अलग बात है कि वो उतना सफल नहीं हो पाया. लेकिन जानकार कहते हैं कि सपा और आरएलडी में एक बुनियादी समानता है. राष्ट्रीय लोकदल और समाजवादी पार्टी दोनों की राजनीति के केंद्र में किसान ही है. इस तरह से दोनों ‘नेचुरल एलायंस पार्टनर’ हैं. इसलिए हो सकता है कि 2022 का चुनाव इस पार्टनरशिप को और मजबूत कर सकता है.

क्या कहता है गणित?

2017 के विधानसभा चुनाव में या उससे पहले समाजवादी पार्टी और आरएलडी का कभी कोई गठबंधन नहीं था. और उस चुनाव में आरएलडी का सिर्फ एक उम्मीदवार जीता था. 2002 के विधानसभा चुनाव में आरएलडी का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन रहा था, जब बीजेपी के साथ उनका गठबंधन था और उन्होंने 14 सीटें जीतीं थी. इसके बाद 2007 में आरएलडी ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया और 10 सीटों पर उनके उम्मीदवार जीते. 2012 का चुनाव आरएलडी ने कांग्रेस के साथ लड़ा और 9 सीटें जीती.

लेकिन पिता की मौत के बाद सारे फैसले जयंत चौधरी ले रहे हैं और 2022 में उन्हीं का निर्णय है कि वह अखिलेश यादव के साथ मिलकर चुनाव लड़े. 2013 से 2019 तक बीजेपी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने में सफल रही है. जिस वजह से इस इलाके के जाट और मुसलमान में एक दूरी आ गई थी. और इसका फ़ायदा बीजेपी को मिला था. सपा-आरएलडी गठबंधन से वो दूरी नज़दीकी में बदल जाएगी.

बीजेपी की क्या है प्लानिंग?

पश्चिमी उत्तर प्रदेश से यूपी विधानसभा में 100 विधायक चुनकर आते हैं. 2017 विधानसभा चुनाव में बीजेपी इनमें से 80 सीटों पर जीती थी. जबकि 2012 के चुनाव में सिर्फ 38 सीटें जीती थीं. 2019 के लोकसभा चुनाव में 18 सीटें बीजेपी जीती जबकि 2014 में 23 सांसद यहां से जीते थे. बीजेपी का ग्राफ इस इलाके में 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के बाद बढ़ना शुरू हुआ. लेकिन किसानों के आंदोलन ने इस ग्राफ को काफी हद तक नीचे लाने का काम किया है और इसका फायदा अखिलेश जयंत के साथ मिलकर उठाना चाहते हैं.

दरअसल कृषि क़ानून की वजह से वहाँ पिछले दिनों जितनी महापंचायत हुईं उसमें जाट-मुस्लिम एकता दोबारा से देखने लगी थी. बीजेपी इसी बात से चिंतित थी. योगी आदित्यनाथ के कैराना दौरे में बीजेपी की यही चिंता साफ़ दिखी. कैराना पहुँच कर योगी आदित्यनाथ ने एक बार फिर ‘हिंदुओं के पलायन’ का मुद्दा अपने भाषण में उठाया था. 

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुसलमान 32 फ़ीसदी और दलित तकरीबन 18 फ़ीसदी हैं. यहाँ जाट 12 फ़ीसदी और ओबीसी 30 फ़ीसदी हैं.

यहां आपको तीन कारण बताते हैं जो इस बात का संकेत देते हैं कि 2022 में जयंत चौधरी और अखिलेश यादव के गठबंधन को लोगों का समर्थन मिल सकता है. पहला – मोदी सरकार ने फैसला लेने में थोड़ी देरी कर दी. इसलिए किसान कहने लगे हैं कि ये फैसले तो हमने उनसे छीना है, ये क़ानून सरकार ने ख़ुद वापस नहीं लिए हैं. दूसरा – किसानों का दुख है, जो इस एक साल में उन्होंने झेला है. किसी फैसले से कोई कितना भी खुश हो, दुख की याद हमेशा साथ रहती है. तीसरा – जंयत के साथ इस बार सिम्पथी वोट भी खूब होगा.

इस बात पर डिबेट हो सकती है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश से उत्तर प्रदेश विधानसभा में कितने विधायक चुनकर आते हैं क्योंकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सीमा के आधार पर यह आंकड़ा बढ़ घट सकता है. लेकिन सीएसडीएस के मुताबिक़ 40-45 सीटों पर जाटों की संख्या बहुत ज़्यादा है. ये सीटें किसी भी पार्टी की जीत और हार के लिए निर्णायक हैं. तो जिस पार्टी ने भी वेस्ट यूपी के मुस्लिम जाट वोट बैंक के गणित को साध लिया उसकी इस इलाके में बल्ले बल्ले हो गई.

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