पूर्व IPS संजीव भट्ट को उम्रकैद, गुजरात दंगों में मोदी की भूमिका पर उठाए थे सवाल

पूर्व आईपीएस संजीव भट्ट को उम्रकैद

गुजरात के पूर्व IPS संजीव भट्ट को जामनगर की अदालत ने उम्र कैद की सजा सुनाई है. पुलिस हिरासत में मौत के मामले में ये सजा सुनाई गई है. जिस मामले में पूर्व आईपीएस संजीव भट्‌ट को जामनगर, गुजरात की अदालत ने सज़ा सुनाई है वह 1990 का है.

गुजरात के पूर्व आईपीएस (भारतीय पुलिस सेवा) संजीव भट्‌ट को उम्रकैद की सज़ा हुई है. जामनगर, गुजरात की अदालत ने पुलिस हिरासत में मौत के मामले में संजीव भट्‌ट और एक और पुलिस अफसर प्रवीण सिंह झाला को भी उम्र कैद की सजा सुनाई. खबर है कि जज डीएम व्यास की अदालत ने संजीव भट्ट और प्रवीम सिंह झाला को हत्या के अपराध में सजा का एलान किया है. आपको बता दें कि इस मामले में अभी पांच और आरोपित है. जिनकी सजा का एलान होने बाकी है.

संजीव भट्‌ट 1988 बैच के आईपीएस आधिकारी हैं. संजीव भट्ट को अभी पालनपुर की जेल में न्यायिक हिरासत में रखा गया है. उनपर इसके अलावा ये भी आरोप है कि उन्होंने 22 साल पहले किसी को फंसाने के मक़सद से उसके ठिकाने पर मादक पदार्थ रखवाए थे. लेकिन अभी जिस मामले में उन्हें सजा सुनाई गई है वो 1990 का है. उस वक़्त संजीव भट्‌ट जामनगर में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के तौर पर तैनात थे.

जब संजीव भट्ट की तैनाती जामनगर में थी तभी बीजेपी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा निकाली जा रही थी. उसके चलते कस्बे में सांप्रदायिक दंगे भड़क गए थे. तब संजीव भट्‌ट ने इस आरोप में 150 लोगों को हिरासत में लिया था. उन्हीं में से एक प्रभुदास वैष्णानी की हिरासत से छूटने के तुरंत बाद अस्पताल में मौत हो गई थी. उनके भाई अमृतलाल ने तब आरोप लगाया था कि पुलिस की पिटाई की वज़ह से प्रभुदास की मौत हुई है.

गुजरात दंगों में नरेंद्र मोदी की भूमिका पर उठाए थे सवाल

संजीव भट्ट वही शख़्स हैं, जिन्होंने 2002 में गुजरात दंगों में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका पर सवाल खड़े किए थे. संजीव भट्ट ने साल 2002 के गुजरात दंगों के सिलसिले में सुप्रीम कोर्ट में एक हलफ़नामा दायर किया था जिसमें उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधे आरोप लगाते हुए कहा था कि गोधरा कांड के बाद 27 फ़रवरी, 2002 की शाम में मुख्यमंत्री की आवास पर हुई बैठक में वे मौजूद थे, जिसमें मोदी ने कथित तौर पर पुलिस अधिकारियों से कहा था कि हिंदुओं को अपना ग़ुस्सा उतारने का मौक़ा दिया जाना चाहिए.

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