किसान किंगमेकर बनने वाले हैं क्या ?

वक्त बदलने की बात है. वक्त से पहले भी कुछ नहीं होता और वक्त निकलने के बाद हाथ मलने के अलावा कुछ नहीं किया जा सकता. भारतीय राजनीति में भी आजकल यही हो रहा है. राजनीतिक दल वक्त को भुनाने में लगे हैं और वक्त की मांग ये है कि किसानों की सुनी जाए.

2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी से किसानों को उम्मीद थी. किसानों ने मोदी के वादों पर रीझ कर उन्हें पीएम की कुर्सी तक पहुंचाने में वोट किया था लेकिन किसानों को खुश करने में मोदी कामयाब नहीं हो सके. कांग्रेस इसी नाकामयाबी को भुनाने में लगी हुई है. अब लोकसभा चुनाव हैं लिहाजा कांग्रेस कोई गलती नहीं करना चाहती. राहुल गांधी के इस बयान से आप समझ सकते हैं कि कांग्रेस की रणनीति क्या है?

‘मोदी जी साढ़े चार साल से प्रधानमंत्री हैं और उन्होंने हिंदुस्तान के किसानों का एक रुपए का क़र्ज़ माफ़ नहीं किया है. कांग्रेस पार्टी और बाक़ी सभी विपक्षी पार्टी एक होकर नरेंद्र मोदी से क़र्ज़ा माफ़ करवाकर दिखाएंगे. हम उनसे लड़ेंगे, एक इंच पीछे नहीं हटेंगे, उनको रात भर सोने नहीं देंगे, जब तक हिंदुस्तान के किसान का क़र्ज़ माफ़ नहीं होगा.”

राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष

अब किसान हाशिए पर नहीं है!

राहुल गांधी ने मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार किसानों के लिए काम कर रही है. कांग्रेस की नई सरकारों ने कर्ज माफ करके ये संकेत भी दिए हैं कि आगे क्या होने वाला है. कुल मिलाकर ये दिखाई दे रहा है कि हमेशा हाशिए पर रहने वाला किसान अब राजनीति के केंद्र में है. अब ये बात साफ हो गई है कि किसानों की नाराजगी भारी पड़ेगी. 2004 में आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडु और कर्नाटक में एसएम कृष्णा की सरकारें किसानों ने गिराईं.

संगठित हुए तो बढ़ेगी मुश्किल

भारत में करीब 10 करोड़ किसान हैं लेकिन ये संगठित नहीं हैं. इसका फायदा राजनीतिक दल उठाते रहे हैं. बीते कुछ चुनावों से किसानों में एकजुटता बढ़ी है और इसका फर्क ये पड़ा है कि 2014 में जो किसान मोदी के साथ खड़ा था वो अब उससे दूर जा रहा है. नरेंद्र मोदी ने एक साल में स्वामीनाथन आयोग की सिफ़ारिशों के आधार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य देने का वादा किया था लेकिन वादा पूरा नहीं किया. ऊपर से 2015 में सरकार ने अदालत में शपथ पत्र देकर ये और कह दिया कि ऐसा करना संभव नहीं है. 2016 में कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने तो ये कह दिया कि कोई वादा किया ही नहीं गया.

किसानों की ताकत को राहुल ने समझा

राहुल गांधी के तेवर बता रहें कि वो किसानों को अपने साथ वो सत्ता हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं. राहुल गांधी ने लोकसभा में 44 सीटों पर सिमटने के बाद भी भूमि अधिग्रहण विधेयक के खिलाफ काम किया और सरकार को घुटने पर ला दिया. राहुल गांधी लगातार किसानों के साथ खड़े होने की कोशिश कर रहे हैं और ये उनके पक्ष में जाता दिखाई दे रहा है. राहुल गांधी किसानों को ये संदेश देने में कामयाब हो रहे हैं कि कर्जमाफी किसानों की समस्याओं का समाधान नहीं बल्कि शुरुआत है.

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