56700 करोड़ खर्च करके खुश होंगे युवा ?

लोकसभा चुनाव से ठीक पहले मोदी सरकार अपने रिपोर्ट कार्ड को दुरुस्त करने की कोशिश कर रही है. सरकार को सबसे ज्यादा मगजमारी करनी पड़ रही है रोजगार के आंकड़ों पर. सरकार ने लेबर ब्यूरो के आंकड़े देकर अपनी पीठ थपथपाई है और कहा है कि मुद्रा योजना से लोगों को स्वरोजगार देने में सरकार कामयाब रही है. ‘पकौड़ा योजना’ भी उसी की जननी है. चुंकि अब चुनाव सिर पर हैं जो सरकार इस दिशा में बड़ा कदम उठा सकती है.

सरकार के आंकड़े और सच

मोदी सरकार की रिपोर्ट और कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टें जमीन आसमान का फर्क है. दुनिया भर की एजेंसियों ने इस बात की तस्दीक की है कि भारत में बेरोजगारी बढ़ी है. लेबर ब्यूरो एंप्लॉयमेंट-अनएंप्लॉयमेंट का सर्वे कहता है

2013-14 में भारत में बेरोज़गारी दर 3.4 प्रतिशत थी जो 2015-16 में चार प्रतिशत हो गई. वहीं, सेंटर फ़ॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईए) के मुताबिक़ नवंबर, 2018 में यह दर 8.5 प्रतिशत तक पहुंच गई थी. आर्थिक नीतियों ने नौकरी कम की हैं.

ऑल इंडिया मैन्युफैक्चरर्स ऑर्गनाइजेशन के सर्वे का कहना है कि 2014 के बाद लघु और मध्यम उद्योगों की नौकरियों में कमी आई है. नोटबंदी और जीएसटी जैसे क़दम उठाकर सरकार ने इन उद्योगों की कमर तोड़ दी.

ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार को इन आंकड़ों की जानकारी नहीं है. सरकार का सब पता है और शायद इसी लिए UBI स्कीम लाई जा रही है. सरकार के सामने कई चुनौतियां हैं और सबसे बड़ी चुनौती है इस योजना के लिए फंड का इंतजाम.

बेरोजगारों के लिए कितना फंड चाहिए ?

अंतरराष्ट्रीय मज़दूर संगठन (आईएलओ) का आंकड़ा कहता है कि भारत में 2019 में बेरोजगारों की संख्या 1.89 करोड़ हो जाएगी. ऐसे में अगर सरकार सभी को 2,500 रुपये देने की योजना बना रही है तो उसे 4 हजार 7 सौ 25 करोड़ रुपये खर्च करने होंगे.  ये एक महीने का खर्च है अब अगर 12 महीनों के हिसाब से देखें तो सरकार को सालाना इसके लिए 56 हजार 700 करोड़ रुपये खर्च करने होंगे. सरकार को ये रकम युवा बेरोजगारों को घर बैठे देनी होगी अगर ये योजना अमल में लाई जाती है. अगर इतना पैसा बेरोजगारों पर खर्च किया जाता है तो फिर किसानों का क्या होगा ? सोचिए !

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