एनएसओ के आंकड़े सरकारी नीतियों के मुंह पर तमाचा हैं!

क्या भारत में गरीबी बढ़ रही है? क्या लोग अपनी जरूरत से भी कम पैसे खर्च कर रहे हैं? क्या भारत में आम लोगों के खर्च करने की हैसियत में गिरावट आई है?

आर्थिक सुस्ती और खस्ताहाल अर्थव्यवस्था को लेकर घिरी मोदी सरकार को एक और जोर का झटका लगा है. झटका इतना जोरदार है कि मोदी सरकार की हवा निकल गई है. एनएसओ का एक और डाटा सामने आया है यह वह डाटा है जिसको काफी समय से सरकार ने दबाए रखा था. डाटा कहता है कि भारत में आम लोगों के खर्च करने की हैसियत में भारी गिरावट आई है. बिजनेस स्टैंडर्ड अखबार की खबर के मुताबिक, अख़बार ने राष्ट्रीय सांख्यिकी संस्थान (एनएसओ) के आंकड़ों के हवाले से बताया है कि 2017-18 में ग्रामीण इलाकों में उपभोक्ताओं के ख़र्च करने की सीमा में 8.8 प्रतिशत की गिरावट देखी गई है. जबकि शहरी इलाके में 2.2 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी देखी गई है.

आपको जानकर हैरानी होगी कि 2011-12 में पर कैपिटा खर्च 1501 रुपए था जो अब घटकर 1446 रुपया रह गया है. यानी प्रति घर कंज्यूमर एक्सपेंडिचर 2011-12 के 1501 रुपये से घटकर 1446 रुपया रह गया है. अख़बार के मुताबिक इससे यह जाहिर होता है कि देश में ग़रीबी बढ़ रही है. यह मौजूदा सरकार के लिए इसलिए भी झटके की तरह है क्योंकि गरीबी खत्म करने के लिए लगातार सरकार काम करने का दावा करती है. ख़बर में यह भी बताया गया है कि एनएसओ ने ये सर्वे जुलाई 2017 से जून, 2018 के बीच किया है. हालांकि इस रिपोर्ट को 19 जून, 2019 को ही जारी किया जाना था लेकिन इसे जारी नहीं किया गया है.

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एनएसओ के इस सर्वे के आने के बाद विपक्ष को एक बार फिर से मौजूदा सरकार को घेरने का मौका मिल गया है राहुल गांधी ने अखबार की कटिंग को ट्वीट करते हुए लिखा,

अखबार में छपी हुई रिपोर्ट बताती है कि गांव देहात के इलाके हो या फिर शहरी इलाके सभी जगह पर फूट कंजंक्शन घटा है देहाती इलाकों में उपभोक्ता खर्च में बीते 4 दशक में सबसे ज्यादा गिरावट देखी गई. इसको आसान भाषा में ऐसे समझ सकते हैं कि गांव देहात के इलाकों में है जो एक आम आदमी खरीदारी करता था वह पिछले 40 साल के मुकाबले इस वक्त सबसे कम कर रहा है अगस्त को आखिरी में समझें तो 8.8 फ़ीसदी की गिरावट इसमें देखी गई है.

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