उत्तराखंड : कुल देवता कर गए पलायन, घर बन गए होम स्टे

उत्तराखंड में पलायन की समस्या विकराल रूप लेती जा रही है. पहाड़ी इलाकों के करीब 1700 गांव वीरान हो गए हैं और लोग तो छोड़िए कुल देवता भी पलायन कर गए हैं. लोगों ने अपने पुश्तैनी घरों को होम स्टे में तब्दील कर दिया है.

गांव के गांव सूने पड़े हैं, अस्पताल में डॉक्टर नहीं, शिक्षा नहीं, रोजगार की कोई व्यवस्था नहीं उत्तराखंड के सैकड़ों गांवों में अब कोई नहीं रहता. आदमी तो आदमी देवताओं ने भी गांव से पलायन कर लिया है और जो लोग बचे हैं उन्होंने अपने पुश्तैनी घर छोड़कर उसे होम स्टे में बदल दिया है जिसके लिए राज्य सरकार 30 फीसदी सब्सिडी दे रही है. होम स्टे उत्तराखंड में कई लोगों के रोजगार का साधन बन गया है.

निर्जन गांवों में बसने कोई नहीं आता. बस आते वो हैं जो शहरों से हताश हो गए हैं और पहाड़ों पर सुकून तलाश रहे हैं. उत्तराखंड में करीब 1700 गांव ऐसे हैं जहां पर लोग नहीं रहते. स्कूल, रोजगार, अस्पताल, सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी के चलते लोगों ने अपने पारंपरिक ठिकानों को छोड़ दिया है. उन्होंने नए ठिकानों पर लोक-देवता भी स्थापित कर लिए हैं.

शहरों में स्थापित हो गए कुल देवता

अभी तक होता ये था कि लोग भले ही शहरों में रहते थे लेकिन वो साल में या दो साल में एक बार अपने गांव जरूर आते थे क्योंकि उन्हें अपने कुल देवता की पूजा करानी होती थी.लेकिन अब वो संभावना भी नहीं है क्योंकि लोगों ने अपने कुल देवताओं के ठिकानों की भी नई जगह पर स्थापना कर ली है. पहाड़ों को छोड़कर लोग हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और देहरादून में ठिकाना बना चुके हैं.

पहाड़ियों के कुल देवता जिसमें लाटा देवता, हरसेम, छुरमुल देवता का मंदिर होते हैं. वो अब मैदानी इलाकों में शहरों में स्थापित कर लिए गए हैं. सरकार ने पलायन रोकने के लिए काम किया और ग्रामीण विकास और पलायन आयोग की कई रिपोर्ट भी आ चुकी है लेकिन पलायन नहीं रुका. और जो रिपोर्ट आईं उसमें पलायन की दर्दनाक कहानियों भरी हुई हैं.

पहाड़ों पर पनप रहा होम स्टे उद्योग

पलायन आयोग को अब बस उम्मीद होम स्टे से है जो पहाड़ों पर निर्जन होते गांव को वीरान होने से बचा पाए. कई युवाओं ने पुश्तैनी घरों को होम स्टे में तब्दील करने का फैसला किया है. ऐसे होम स्टे की संख्या 700 पार कर चुकी है. कुछ ऑर्गेनिक खेती, डेयरी-पोल्ट्री जैसे व्यवसाय अपना रहे हैं. सरकार को उम्मीद है कि ऐसे युवा ही पहाड़ों से होते पलायन के दंश से बचाएंगे. और लोग सुकून की तलाश में पहाड़ों पर लौट के आएंगे.

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