लोकसभा चुनाव 2019: प्रियंका गांधी की सक्रियता से यूपी में मुकाबला दिलचस्प हो गया है

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जिस उत्तरप्रदेश में कांग्रेस 2014 के लोकसभा चुनाव में सिर्फ 2 सीटें जीत पाई थी वहां इस बार समीकरण बदल गए हैं. कांग्रेस महासचिव और पूर्वी यूपी की प्रभारी बनने के बाद प्रिंयका गांधी ने जिस तरह की सक्रियता दिखाई है वो बीजेपी समेत सभी क्षेत्रिय दलों के लिए सिरदर्द बन गईं हैं.

यूपी की कुल 80 लोकसभा सीटों में से बीजेपी को 71 सीटें मिलीं थी. 2017 में हुए विधानसभा चुनावों में भी बीजेपी ने यूपी में ऐतिहासिक बहुमत हासिल किया था. 2017 के बाद प्रदेश के क्षेत्रिय दलों में माहौल बनने लगा कि बीजेपी को हराना है तो साथ आना होगा. और इसके बाद सपा-बसपा ने हाथ मिलाया. इन दोनों की दोस्ती का नतीजा हुआ कि बीजेपी उपचुनाव में हार गई. यही प्रयोग लोकसभा चुनाव में भी आजमाया गया है. लेकिन कांग्रेस इस प्रयोग का हिस्सा नहीं है लिहाजा उसने प्रियंका के रूप में अलग प्रयोग किया.

प्रियंका गांधी भले ही कांग्रेस को ज्यादा सीटें ना दिला पाएं लेकिन ये तो तय है कि वो बाकी दलों की नींदे हराम करने का दम रखती हैं. प्रियंका गांधी का कांग्रेस महासचिव बनना और पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनना प्रदेश की राजनीति में हलचल पैदा करने वाला है. प्रियंका गांधी लगातार सक्रिय हैं और वो लोगों से मुलाकात कर रही हैं. प्रदेश के नेताओं के साथ मिल रही हैं. अलग-अलग तबकों के साथ बैठकें कर रही हैं. और प्रदेश सरकार को घेर रही हैं.

प्रियंका गांधी की तीन दिन की गंगा यात्रा भी काफी सुर्खियों में रही थी. प्रियंका की सक्रियता का असर ये हुआ है कि प्रदेश में कांग्रेस उत्साह से भरे हुए दिखाई दे रहे हैं. पूरे प्रदेश में प्रियंका गांधी की सभाएं कराने की मांग कांग्रेसी कर रहे हैं. प्रियंका की आवक ने राजनीतिक जानकारों को ये मानने पर मजबूर कर दिया है कि कांग्रेस को हल्के में आंक कर गठबँधन ने गलती कर दी है. प्रियंका गांधी की सक्रियता के बाद कांग्रेस जो सीटें जीतने की स्थिति में नहीं भी होगी, वहां भी वह दूसरे दलों का ठीक-ठाक वोट काटेगी.

2009 में कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में 21 सीटें जीती थीं. 2014 में नरेंद्र मोदी की लहर में पार्टी रायबरेली और अमेठी यानी सिर्फ दो सीटों पर सिमट गई. 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 18.3 प्रतिशत वोट मिले थे. प्रियंका गांधी अगर प्रदेश में लगातार सक्रिय रहती हैं तो पार्टी 2009 वाला प्रदर्शन दोहरा सकती है.

अगर पिछड़ों और अल्पसंख्यकों का वोट कांग्रेस ज्यादा काटती है तो इससे सपा-बसपा गठबंधन को नुकसान होगा. वहीं अगर कांग्रेस किसी सीट पर अगड़ी जातियों का वोट काटती है तो इससे भाजपा का नुकसान होगा. कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि प्रियंका ने यूपी में मुकाबला त्रिकोणीय कर दिया है. कांग्रेस ने 2009 में जहां जीत हासिल की थी वहां पर मुकाबला और ज्यादा दिलचस्प हो गया है.

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