लोकसभा चुनाव 2019: पुलवामा हमले के बाद प्रियंका गांधी चुप क्यों हैं ?

कांग्रेस महासचिव और पूर्वी यूपी की प्रभारी प्रियंका गांधी लोकसभा चुनाव लड़ेगी या नहीं ये अभी भी प्रश्न ही है. उम्मीद ये थी कि रायबरेली से वो इस बार मैदान में उतर सकती हैं लेकिन ऐसा नहीं हुआ. रायबरेली से एक बार फिर से सोनिया गांधी ही चुनाव लड़ रही हैं. बड़ा प्रश्न ये है कि प्रियंका इन दिनों कर क्या रही हैं. पुलवामा हमले के बाद से वो चुप क्यों हैं ?

11 फरवरी को लखनऊ में हुए रोड-शो के बाद चार दिन पांच रातों तक प्रियंका गांधी काफी सक्रिय रहीं. इस दौरान उन्होंने करीब 4 हजार पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ मुलाकात की थी. अपने लखनऊ दौरे के आखिरी दिन वो प्रेस कॉन्फ्रैंस करने वाली थीं लेकिन पुलवामा आतंकी हमले के बाद उन्होंने ये प्रेस कॉन्फ्रैंस रद्द कर दी. अहमदाबाद में होने वाली कार्यकारिणी की बैठक में प्रियंका गांधी को भाषण देना था लेकिन वो बैठक भी कांग्रेस ने रद्द कर दी.

कांग्रेस के लिए जरूरी हैं प्रियंका

आप ये मानकर चलिए कि प्रियंका गांधी इस वक्त कांग्रेस की जरूरत हैं. यूपी की 80 लोकसभा सीटों में से वो 30 सीटों पर फोकस ज्यादा कर रही हैं. ये वो सीटें हैं जहां पर कांग्रेस मजबूत रही है. उन्होंने अन्य समान विचारधारा वाली पार्टियों के साथ गठबंधन की ओर इशारा भी किया है. इसका कारण ये है कि जिस पूर्वी यूपी की उन्हें जिम्मेदारी मिली है वहां उनका सीधा मुकाबला नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ से है. यही कारण है कि उन्होंने अपनी तैयारी को सोचसमझकर और पूरी रणनीति के साथ शुरु किया है.

छोटे दल और बागियों पर नज़र

कांग्रेस ने यूपी में महान दल से गठबंधन किया है. महान दल के नेता केशव देव मौर्य हैं और उनकी पार्टी की पकड़  कुशवाहा, निषाद, नाई, राजभर समाज में है. यूपी में यादवों के बाद इन बिरादरियों की पिछड़ों सबसे ज्यादा तादाद है. उन्होंने बीजेपी की बहराइच से सांसद सावित्री बाई फुले को भी कांग्रेस के साथ जोड़ लिया. फुले लंबे वक्त से बीजेपी से खफा चल रही थीं. कांग्रेस में सपा नेता और फतेहपुर के पूर्व सांसद राकेश सचान भी कांग्रेस में शामिल हो गए हैं. ये सभी नेतान प्रियंका की वजह से ही कांग्रेस से जुड़े ऐसा माना जा रहा है.

रणनीति पर काम कर रहीं प्रियंका

प्रियंका खामोशी से अपनी रणनीति पर काम कर रही हैं. बताया  जा रहा है कि कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने लोकसभा चुनाव के लिए सभी सीटों पर समन्वयक की तैनाती कर दी है. इन समन्वयकों को कम्प्यूटर से लेकर चुनाव प्रबन्धन की ट्रेनिंग दी गई है. आपको बता दें की अभी तक सिर्फ अमेठी, रायबरेली में ही समन्वयक हुआ करते थे. प्रियंका ने कहा है कि ये समन्वयक अपने-अपने क्षेत्रों में चुनाव और पार्टी नेताओं से जुड़ी हर छोटी-बड़ी गतिविधियों पर निगाह रखेंगे. आपको बता दें कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस पहले ही समन्यवयकों की तैनाती करके चुनाव जीत चुकी है. ये समन्वयक प्रियंका को सीधी रिपोर्ट करेंगे..

प्रिंयका ने प्रोफेशनल टीम बनाई

चुनाव के लिए प्रियंका गांधी ने प्रोफेशनल  टीम बनाई है. इसमें रॉबिन शर्मा सलाहकार है. रॉबिन प्रशांत किशोर की अगुवाई वाले सिटीजन फॉर एकाउंटेबल गवर्नेंस (सीएजी) के को-फाउंडर हैं और इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमिटी के लिए भी काम करते हैं. मोदी की चाय पे चर्चा का आइडिया उन्हीं का था 2014 में. 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार की ‘हर घर नीतीश, हर मन नीतीश’ नाम से निकाली गई साइकिल यात्रा और 2017 के उत्तर प्रदेश के चुनाव में राहुल गांधी के ‘खाट सभा’ अभियान के पीछे भी रॉबिन शर्मा ही थे.

प्रिंयका का छोटी सभाओं पर फोकस

कहा जाता है कि प्रियंका गांधी को बड़ी रैलियां पसंद नहीं हैं. वो नुक्कड़ सभा, मोहल्ला सभा, चौपाल और रोड शो पर ज्यादा फोकस कर रही हैं. प्रियंका मानती हैं कि छोटी सभाओं में लोगों से सीधे कनेक्ट करना आसान होता है. इसके अलावा वो रोड-शो करेंगे और उसका रूट ऐसा होगा जो ज्यादा ज्यादा इलाके को कवर करे. पुलवामा हमले के बाद प्रियंका की चुप्पी के पीछे सबसे अहम कारण ये है कि वो मोदी और योगी से ऐसे माहौल में टकराएंगी जब राष्ट्रप्रेम और देश की सुरक्षा का मुद्दा गरम है. बेरोजगारी और किसानों के मुद्दे पीछे हैं. अब जरूरी ये हो जाता है कि प्रियंका जिस रणनीति पर काम कर रहीं है वो लोगों को कितना रास आएगी.

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