13 पॉइंट रोस्टर मामला मोदी सरकार की मुश्किल बन सकता है?

प्रधानमंत्री ने संसद में अपने संबोधन के दौरान सामान्य वर्ग के गरीब तबके को 10 फीसदी आरक्षण के फैसले का जिक्र किया. पीएम मोदी का ये फैसला गेमचेंजर बताया जा रहा है. लेकिन आरक्षण को लेकर एक और मामला है तो जो पीएम मोदी की मुश्किल भी बन सकता है.

13 पॉइंट रोस्टर मामले में एससी-एसटी और ओबीसी संगठनों में गुस्सा है. तमाम संगठन लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं. यूनिवर्सिटी में शिक्षक भर्तियों को लेकर बनाए गए इस फ़ॉर्मूले को लेकर कहा जा रहा है कि इससे आरक्षण व्यवस्था खतरे में है. विपक्ष अगर इस मुद्दे पर सही तरीके से उठा पाया तो लोकसभा चुनाव में बीजेपी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं.

हालांकि राहुल गांधी ने मोदी सरकार  इस मामले में घेरना शुरू कर दिया है. उन्होंने 2 फरवरी को ट्वीट करके मोदी सरकार पर निशाना साधा. कहा है कि 13 पॉइंट रोस्टर के ज़रिए यूनिवर्सिटी में गरीबों की नौकरी के मौके खत्म किए गए हैं.

मामला क्या है ?

देश की सभी यूनिवर्सिटी में आरक्षण की व्यवस्था को लागू करने के लिए 2005 में यूपीए सरकार के तहत कार्मिक एवं शिक्षा विभाग ने शिक्षक भर्तियों में एससी-एसटी और ओबीसी आरक्षण सही तरह से लागू कराने के लिए कदम उठाए. विभाग ने यूजीसी को चिट्ठी लिखी और उसके बाद यूजीसी ने भर्ती प्रक्रिया के लिए तीन सदस्यीय समिति बनाई.

इस समिति ने यूनिवर्सिटी को इकाई मानकर 200 पॉइंट रोस्टर बनाया. इस रोस्टर में पदों को इस तरह से रखा गया कि वंचितों को आरक्षण मिल सके. इस रोस्टर में पहला, दूसरा और तीसरा पद सामान्य वर्ग के लिए और इस बाद चौथा पद ओबीसी के लिए आरक्षित किया. पांचवां, छठा पद सामान्य वर्ग और सातवां पद एससी के लिए आरक्षित किया गया.

एसटी के लिए 14वां पद आरक्षित किया गया. समिति ने जो फॉर्मूला बनाया उससे यूनिवर्सिटी में शिक्षक नौकरियों में वंचितों को आरक्षण मिलना तय हुआ. लेकिन यूनिवर्सिटी ने ये रोस्टर स्वीकार नहीं किया और वो इलाहाबाद हाई कोर्ट में अपनी की. 2018 में हाईकोर्ट ने इसमें फैसला सुनाया, फैसले में कहा,

अब शिक्षकों की भर्ती विश्वविद्यालयों को इकाई न मानते हुए, उनके विभागों को इकाई मानकर की जाए.’

इससे बाद एक और विवाद खड़ा हो गया क्योंकि यूनिवर्सिटी की अपेक्षा विभाग के स्तर पर पदों की संख्या घट जाती है लिहाजा 200 पॉइंट रोस्टर की जगह 13 पॉइंट रोस्टर लाया गया. इसमें फॉर्मूला पुराना है लेकिन पदों की संख्या घट जाने के चलते आरक्षण न मिल पाने की संभावना बढ़ गई. इसलिए इस रोस्टर का विरोध शुरु हो गया.

आरक्षण की ज़द में आने वाले वर्गों को कहना है कि ज़्यादातर विभागों में पदों की संख्या 13 भी नहीं है, ऐसे में वंचित तबक़ों को आरक्षण नहीं मिल पाएगा और यूनिवर्सिटी में सामान्य वर्ग के शिक्षकों की संख्या बढ़ जाएगी. एक अंग्रेजी अखबार के मुताबिक 13 पॉइंट रोस्टर से आरक्षित पदों की तादाद में 100 फीसदी तक कमी आ सकती है.

क्योंकि विभागवार रोस्टर लागू करने से से आरक्षित तबके की नौकरियां घट जाएंगीं. और सामान्य वर्ग को 30 से 40 फीसदी सीटों का फायदा होगा. इसके लिए आरक्षित श्रेणी में आने वाला तबका मोदी सरकार को दोषी ठहरा रहा है. क्योंकि मोदी सरकार ने इस 13 पॉइंट रोस्टर पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आते ही इसे लागू करने का आदेश दे दिया है.

विरोध को देखते हुए मोदी सरकार इस हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तो गई लेकिन जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने 13 पॉइंट रोस्टर के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर दी. लिहाजा अब यूनिवर्सिटी में  अब शिक्षकों की भर्ती 13 पॉइंट रोस्टर फॉर्मूले से ही होगी. अब वंचित तबके का कहना है कि मोदी सरकार ने 13 पॉइंट रोस्टर के खिलाफ कमजोर दलील पेश की है.

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इकॉनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक मोदी सरकार ने सिर्फ 3 सैंट्रल यूनिवर्सिटी का डेटा सुप्रीम कोर्ट में रखा. हालांकि विरोध को देखते हुए सरकार ने 20 यूनिवर्सिटी का डेटा जमाकर करके पुनर्विचार याचिका दायर करने का विचार किया है.

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