क्या भारत में संभव है न्यूनतम आमदनी का कॉन्सैप्ट ?


राहुल गांधी ने छत्तीसगढ़ में जब ये बयान दिया कि अगर कांग्रेस की सराकर बनती है तो वो सभी को गारंटी से न्यूनतम आमदनी देंगे लेकिन क्या ये संभव है. और इसके लिए कितना पैसा चाहिए होगा. कांग्रस राहुल गांधी के इस एलान को एतिहासिक बता रही है और कह रही है कि ये क्रांतिकारी कदम होगा.

कांग्रेस नेता पी चिदंबरम ने राहुल गांधी के इस एलान के बाद तुरंत ट्वीट किया और कहा कि ये एलान बदलाव लेकर आएगा, उन्होंने लिखा

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने छत्तीसगढ़ की किसान रैली में एक ऐतिहासिक घोषणा की है और ये ग़रीबों की ज़िंदगी में एक बदलाव लेकर आएगी. यूनिवर्सल बेसिक इनकम के सिद्धांत पर बीते दो सालों से गहन विचार-विमर्श चल रहा है. और अब वह समय गया है जब हम इस सिद्धांत को अपनी ज़रूरतों के हिसाब से ढालकर ग़रीबों के लिए इसे अमल में लाएं. साल 2004 से 2014 के बीच 14 करोड़ लोगों को ग़रीबी के चंगुल से आज़ाद कराया गया. अब हमें भारत से ग़रीबी मिटाने का संकल्प करना होगा. भारत के ग़रीबों का देश के संसाधनों पर पहला हक़ है. कांग्रेस उन संसाधनों की तलाश करेगी जिनकी मदद से राहुल गांधी की योजना को अमल में लाया जा सके.”

गरीबों को गरीबी के चंगुल से बाहर निकालने के लिए जिस योजना का जिक्र राहुल गांधी कर रहे हैं क्या वो अमल में लाई जा सकती है. क्योंकि सभी गरीबों को न्यूनतम आमदनी देने के लिए जो पैसा चाहिए होगा वो सरकार कहां से लाएगी. क्योंकि अगर सरकार खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत आने वाले लोगों को न्यूनतम आमदनी की जाती है तो सरकार को 97 करोड़ लोगों को पैसा देना होगा.

97 करोड़ लोगों के हिसाब से देखें तो 5 लोगों के एक परिवार के हिसाब से 20 करोड़ परिवार हुए. 20 करोड़ परिवारों को अगर एक हजार रुपये महीना भी अगर सरकार देती है तो इस योजना के लिए 240000 करोड़ रुपये की जरूरत होगी. यानी 167 लाख करोड़ की GDP में ये आंकड़ा 1.5 फीसदी का है. इतनी रकम जुटाना सरकार के लिए आसान नहीं है. दूसरा ये भी कि सरकार इसलिए क्या लोगों को क़ानूनी अधिकार देगी. क्योंकि कई मुल्कों में न्यूनतम आमदनी का कानून है.

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