प्रियंका की एंट्री से बीजेपी को बेल्लारी का चुनाव याद आ रहा होगा !

लंबे इंतजार के बाद प्रियंका गांधी पॉलिटिक्स में आ ही गईं. कांग्रेसी कार्यकर्ता लंबे वक्त से इस दिन का इंतजार कर रहे थे. 2014 के लोकसभा चुनाव में हारने के बाद भी कांग्रेस के अंदर से प्रियंका गांधी को आगे बढ़ाने के लिए आवाजें उठीं थीं. 2017 में यूपी का विधानसभा चुनाव हारने के बाद भी कांग्रेस पार्टी में प्रियंका की भूमिका तय करने की मांग उठी थी.

2013 अगस्त की बात है जब अब के प्रयागराज और तब के इलाहाबाद में आनंद भवन पर एक पोस्टर लगाया गया था. इस पोस्टर में प्रियंका गांधी की तस्वीर थी और लिखा था,

मैया रहती है बीमार, भैया पर बढ़ गया है भार, प्रियंका फूलपुर से बनो उम्मीदवार, पार्टी का करो प्रचार, कांग्रेस की सरकार बनाओ तीसरी बार.

जैसे ही ये पोस्टर मीडिया में आया पोस्टर लगाने वाले पार्टी कार्यकर्ता हसीब अहमद को पार्टी से निकाल बाहर कर दिया गया. लेकिन हसीब की बात सुनी गई और अगस्त 2013 के बाद जनवरी 2019 में वो जो चाहते थे वही हुआ. प्रियंका गांधी महासचिव बनी और उन्हें पूर्वी यूपी की कमान सौंपी गई है.

ज्योतिरादित्य सिंधिया को पश्चिम यूपी और प्रियंका गांधी को पूर्वी यूपी का प्रभार देकर राहुल गांधी ने ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल किया है. राहुल गांधी को उम्मीद है कि अब यूपी में कांग्रेस की कालापलट हो जाएगी. राहुल गांधी ने अपने इस फैसले के बाद अमेठी में प्रतिक्रिया दी,

"मैं प्रियंका गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया पर भरोसा करता हूं. हम बैकफुट पर नहीं खेलेंगे. मैं प्रियंका और ज्योतिरादित्य को केवल दो महीने के लिए नहीं भेज सकता. मैं इन्हें उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की विचारधारा को बढ़ाने के लिए भेज रहा हूं."

कांग्रेस को चमत्कार की उम्मीद है. क्योंकि वो उम्मीद कर रही है कि प्रियंका गांधी कांग्रेस में कार्यकर्ताओं के टोके को खत्म करेंगीं. राहुल गांधी उम्मीद कर रहे हैं कि प्रियंका कांग्रेस के परंपरागत दलित, मुसलमान और ब्राह्मण वोटरों को जोड़ पाएंगी. क्योंकि ये तीनो वर्ग अभी अलग अलग पार्टियों में हैं. लिहाजा इसे जोड़ने के लिए प्रियंका पर दांव खेला गया है.

कांग्रेस प्रियंका गांधी में इंदिरा गांधी का अक्स देखते हैं. उनके जैसी शैली, हाव-भाव, मास अपील, लोगों से कनेक्ट, ये सभी बातें प्रियंका को मजबूत करती हैं. लेकिन यहां ये समझना जरूरी है कि बीते तीन दशक में कांग्रेस की जमीन यूपी में लगभग खत्म हो चुकी है. हालत ये है कि कभी पहले नंबर की पार्टी रही कांग्रेस आज चौथे नंबर पर है. तो प्रियंका गांधी के लिए खोई जमीन वापस पाना एक मुश्किल काम होगा.

प्रियंका के पक्ष में जो बात जाती है तो है मास कनेक्ट. 1999 में बेल्लारी में सुषमा स्वराज के सामने सोनिया गांधी का चुनाव प्रचार उन्होंने ही किया था वो युवा थीं लेकिन गैर हिंदी भाषी राज्य में उन्होंने लोगों से उत्साह पैदा किया और उनका ज़बरदस्त कनेक्ट था. तो यूपी जहां वो लागातार काम करती रही हैं और लोग उन्हें अच्छी तरह से जानते हैं इसका फायदा कांग्रेस लेना चाहेगी.

दूसरी बात ये है कि वो उस इलाके की कमान संभालेंगी जहां पर योगी आदित्यनाथ और नरेंद्र मोदी दोनों पहले से ही डटे हुए हैं. गोरखपुर और काशी पूर्वी यूपी के दो महत्वपूर्ण जिले हैं और दोनों बीजेपी के गढ़ माने जाते हैं. ये वो इलाका है जहां लोकसभा की 28 सीटें हैं और यहां बीजेपी और गठबंधन का सीधा मुकाबला माना जा रहा है. कांग्रेस प्रियंका को उतारकर इसे तिकोना कर सकती है.

एक बात और ध्यान देने वाली है कि काउबेल्ट में कांग्रेस की ब्राह्मणों में अच्छी पकड़ है. लेकिन पिछले कुछ चुनावों से ये वोट कांग्रेस से छिटका है. प्रियंका अगर ये वोट हासिल कर लेती हैं तो ये उनकी बड़ी कामयाबी होगी और बीजेपी की बड़ी हार. यहां राहुल गांधी की ये बात भी याद रखनी जरूरी है कि वो कह रहे है कि उनका गठबंधन से बैर नहीं है. तो इसका मतलब ये है कि वो गठबंधन को नुकसान पहुंचाना नहीं चाहते.

प्रियंका को सक्रिय राजनीति में लाने की टाइमिंग पर गौर इसलिए जरूरी है क्योंकि तीन राज्य बीजेपी से छीनने के बाद और खुद पार्टी अध्यक्ष के तौर पर मजबूत करने के बाद राहुल उन्हें राजनीति में लाए हैं. यानी अभी राहुल की परिवक्वता को लेकर जो संशय था वो खत्म हो चुका है और अब पार्टी नई रणनीति पर काम कर रही है.

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