‘नितियां हैं लेकिन नियत नहीं, इसलिए ‘नर्क’ है किसानों की जिंदगी’


सरकार किसान,किसान कर रही है. विपक्ष किसानों के नाम की माला जप रहा है. लेकिन विड़वना ये है कि किसानों के जीवन में आमूलचूल परिवर्तन भी नहीं आयी है. हालात जस के तस हैं. क्यों है ऐसा इसका जवाब हम नहीं वरिष्ठ बीजेपी नेता मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ने दिया है.

पीएम से लेकर कैबिनेट के सभी मंत्री और बीजेपी शासित राज्यों के मुखिया बार-बार ये कहते हैं कि 2022 तक किसानों की आय दोगुनी की जाएगी. दावा किया जाता है कि सरकार की प्राथमिकता किसानों की आय दोगुनी कर देने का है. अब ये कितना बड़ा झूठ है. ये बात आपको वो समिति बताएगी जिसके मुखिया बीजेपी नेता मुरली मनोहर जोशी हैं. जीहां संसद की प्राक्कलन समिति का कहना है

‘कृषि को लेकर केंद्र सरकार द्वारा कई सारी योजनाएं चलाई जा रही हैं लेकिन इनका जोर किसानों की आय बढ़ाने पर नहीं है. टिकाऊ कृषि के लिए राष्ट्रीय मिशन’ दस्तावेज़ में कृषि के विभिन्न पहलुओं का उल्लेख है लेकिन इसमें किसानों को आय सुरक्षा देने का महत्वपूर्ण तत्व गायब है. फसल बीमा योजना और सरकार द्वारा लागू की गई न्यूनतम समर्थन योजना किसानों के लिए खेती को फायदे का व्यवसाय बनाने में सक्षम नहीं है.’

ऐसा नहीं है कि सरकार टिकाऊ खेती के लिए पहल नहीं कर रही. किसान के लिए सरकार नीतियां बना रही है. लेकिन  स्थायी व्यवसाय के रूप में कृषि तभी बच सकती है जब किसानों को खुद को बचाए रखने का मौका दिया जाएगा. समिति ने सुझाव भी दिया है. दरअसल मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता वाली संसद की प्राक्कलन समिति ने जलवायु परिवर्तन पर नेशनल एक्शन प्लान का प्रदर्शन’ पर 30वीं रिपोर्ट तैयार की है. इस रिपोर्ट में कुल आठ राष्ट्रीय मिशन आते हैं जिसमें कृषि भी है. इस रिपोर्ट में सरकार की कृषि से संबंधित योजनाओं के आंकड़े और उनके लागू करने की स्थिति के बारे में विस्तृत जानकारी मांगी थी. समिति ने कहा है कि

रासायनिक खेती का जलवायु परिवर्तन में काफी योगदान है. ऐसी खेती की वजह से मृदा, पानी और किसानों की स्थिति खराब हो रही है. भारत सबसे कम कीटनाशक प्रयोग करने वाले देशों में से एक है.

कृषि मंत्रालय ने समिति को दिए जवाब में बताया कि इस समय भारत में 18.70 लाख हेक्टेयर जमीन पर जैविक खेती होती है. इतना ही नहीं देश में ज्यादातर भूमि सिंचाई के लिए बारिश के भरोसे है और सरकार ने पानी संरक्षण के लिए कोई काम नहीं किया है. ये इसलिए भी गंभीर समस्या है क्योंकि भारत में दुनिया की 15 फीसदी आबादी है, लेकिन दुनिया के जल संसाधनों का केवल 4 फीसदी हिस्सा भारत में है. समिति ये भी बताती है कि देश में सिर्फ 35 फीसदी कृषि भूमि सिंचित है. यानी 65 फीसदी खेती पूरी तरह से बारिश पर निर्भर करती है.

 ‘4,525 बड़े और छोटे बांधों के निर्माण के बाद भी, देश केवल प्रति व्यक्ति के हिसाब से 213 घन मीटर ही पानी का भंडारण तैयार कर पाया है. वहीं रूस में ये आंकड़ा 6,103 घन मीटर प्रति व्यक्ति, ऑस्ट्रेलिया में 4,733 घन मीटर प्रति व्यक्ति, अमेरिका में 1,964 घन मीटर प्रति व्यक्ति, और चीन में 1,111 घन मीटर प्रति व्यक्ति में प्रति व्यक्ति है. अमेरिका और चीन के मुकाबले भारत उत्पादन के लिए दोगुना पानी का इस्तेमाल करता है.’

समिति का कहना है कि अगर सरकार वाकई में किसानों की हमदर्द है और उसे बचाना चाहती है तो उनके लिए बेहतर बीज, कृषि के बेहतरीन प्रयोगों और आपदा की स्थिति में सरकारी मदद दी जानी चाहिए. उन बहुराष्ट्रीय और बड़ी कंपनियों पर नकेल कसनी चाहिए जो महंगी कीमत पर बीच बेचती हैं, जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग को बढ़ावा देना चाहिए, समिति ने ये भी कहा है कि सरकार को इस तमाम कदमों की जानकारी देनी चाहिए. क्योंकि मौजूदा वक्त में सरकार ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया है कि जिससे किसानों की आय बढ़ सके.

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