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व्यंग: डेस्परेट हाउस एंकर्स

सावरकर और गांधी को लेकर, साहित्य आज तक पर डिबेट हुई, और तब से हंगामा मचा हुआ है।

चित्रा त्रिपाठी के डेस्परेट ट्वीट वाइरल हो रहे है। मानो उनकी वाट लगी पड़ी हो।
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टीवी देखना बरसो पहले बन्द कर चुके। जब बरसो से टीवी पर छाए भरोसेमंद नाम, एक एक कर स्टूडियो से विदा हो गये।

न्यूज स्टूडियो साधारण और प्रतिभाहीन लोगों को पोसने की प्रयोगशाला बने। और चित्रा न्यूज चैनलो पर पत्रकारिता के शून्य में उपजी खरपतवार हैं।

ये पत्रकारिता का अंधेर युग है। इस अंधेरे में आपका ध्यान खींचने के लिए चित्रा कभी “खाट खड़ी” करती है, कभी “वाट लगाती” हैं ।
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प्रतिभाहीन होना तो कोई अभिशाप नही। प्रकृति और ईश्वर का आशीर्वाद न होने के बावजूद ऐसे लोग, कमा खाकर आराम से अपना जीवन गुजार जाते हैं।

दिक्कत तब शुरू होती है, जब आप खुद को माइलस्टोन बनाने की कोशिश करते हैं। अपने बदन से बड़े विशाल जूतों में पैर डालकर खड़े है,  तो अब भी कद वैसा ही चाहते है।

अहसास ए कमतरी, यही से शुरू होता है।
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याद रहे, सुपीरियरटी कॉम्प्लेक्स दरअसल इन्फिरियरटी कॉम्प्लेक्स का ही प्रदर्शन होता है।

दो दिन से चित्रा जिस तरह @Ashok_Kashmir को नीचा दिखाने की कोशिश कर रही है, धमका रही हैं, उसी न्यूज के स्क्रीनशॉट शेयर कर रही है, जिसे पढा जाने पर भरे मंच में खंडन हो चुका।

और कहती है- जनाब इतिहास हमने भी पढ़ा है.. । ओह, क्या उसी स्क्रीनशॉट से??

स्कॉलर या अध्येता छोड़िये, एक पत्रकार के बतौर उनकी पहचान नहीं। एंकर के थोड़ी बहुत कुछ पहचान हो, तो उसका भी सत्यानाश कर लिया है।
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अशोक पांडेय जैसे स्कॉलर्स को अपने मंच पर बुलाना आपकी महानता नही, मजबूरी है।  डेस्परेट कोशिश है, आपके डूबते चैनल को चवन्नी भर क्रेडिबिलीटी दिलाने की। 

लेकिन व्यंगात्मक शैली में एक पक्ष को ताना देना, विषय से हटकर की का रही बकवास को संरक्षण देना, पहले हूटिंग के लिए उकसाना फिर उसे शांत कराने का एहसान दिखाना। अंत मे एक पैनलिस्ट के साथ ट्विटर की बदसूरत बहस.. दो कौड़ी-ट्रोल-ब्लॉ ब्लॉ

बताता है कि चैनल मालिकान की क्रेडिबिलीटी हासिल करने की कोशिश या तो आधे मन से है, या फिर चित्रा इस मिशन के लायक योद्धा नही।
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दरअसल चित्रा, अंजना, श्वेता, सुधीर जैसे पत्रकार वो गार्बेज हैं, जिन्होंने इंडिया टुडे जैसे नामचीन ग्रुप को कूड़ादान में बदल दिया है। 

कूड़ा युग में कंगूरों पर कलरव करते ये एंकर, आत्ममुग्ध प्रतिभाहीन बादशाह के आत्ममुग्ध नवरत्न हैं।

पत्रकारिता तो इन्हें इनके हाल पर छोड़कर, यू ट्यूब और सोशल मीडिया के रास्ते, बहुत आगे जा चुकी। अब ऊँचे मंचो पर चढ़े ये बौने, समाज  जरा सी ही सही, इज्जत तलाश रहे हैं।

जिस देश ने नलिनी सिंह, एस पी सिंह, विनोद दुआ, प्रणब रॉय जैसे टीवी पत्रकारों को देखा है। जिसने रवीश, पुण्य प्रसून, विक्रम चंद्रा और राजदीप सरदेसाई में भी खोट निकाले हों,

वो खाट बिछाती, वाट लगाती चित्रा एंड सहपाठी को कितना सीरियसली ले सकता है..
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चित्राओ को सलाह है, कि जुबान पर लगाम रखें। सैलरी लें, और ऐसी गलतियों से परहेज करें।

क्योकि रेजीम भी बदलेगा, दौर भी बदलेगा। नौकरियो और न्यूजरूम में प्रतिभाशून्यता को अनिवार्य योग्यता मानने का दौर भी खत्म हो जायेगा।

तब वाट और खाट की ताल मिलाती का दौर भी खत्म होगा।

तब आपका यूट्यूब चैनल भी कोई न देखेगा।

(मनीष सिंह की एक्स वॉल से)

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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