ख़्याल रहे इस ‘रण’ का कृष्ण भी तू और अर्जुन भी तू !

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“ऐसे रामराज्य की कल्पना आज के सत्ताभोगियों के बीच करना बेमानी है। रामनामी दुपट्टे में लिपटी सत्ता मंदिर तो बना देगी लेकिन पेट की बढ़ती ज्वाला को मंहगाई से लगी आग से राख में बदलने से न रोक पाएगी।”

‘विकास की लहर‘ और ‘पारदर्शी सरकार‘ का दावा करने वाले भूल जाते है कि काम अपने-आप में बोलता है। उसे रंगीन छपे चिकने कागज़ पर उतारने की आवश्यकता नहीं। वह साक्षात नज़र आता है, उसके लिए डमी या नाटकीय पात्रों या बड़े-बड़े साइन बोर्डों की आवश्यकता नहीं होती। चुनाव के दौरान उसका रेचन करना खुद के गढ़े अमृत की पोटली को सत्यापित करने जैसा ही लगता है। क्योंकि जगमगाते रोशनी से नहाये शहर को छोड़ते ही इसकी सत्यता की पुष्टि अपने नग्न स्वरूप में सामने नज़र आती है। फैलती भयावह बीमारी के दौरान महज स्व-स्वार्थवश देर से लिए गये निर्णयों से मौत की चादर से जमीन को पटते जिसने देखा हो, करूण विलाप के चीत्कारों की आवाज से जिनके हृदय अभी भी दग्ध है, उस जनता के दर्द को सहानभूति से ज्यादा राजनैतिक इस्तेमाल की वस्तु समझकर उसका प्रचार-प्रसार करना मानवता की हत्या ही तो है। पर हाय री भारत की अबोध अनपढ़ गरीब जनता 500 रूपल्ली और 5 किलो राशन के लिए सात खून भी माफ़ करना भी जानती है।

इसमें कोई संदेह नहीं इसमें कि जनता की याददाश्त ज्यादा पीछे तक नहीं जाती। इसीलिए अक्सर कई विकास कार्यों के बटन चुनाव से छहः महीने पहले ही फटाफट दबाये जाने लगते है। अब कमजोर लेकिन असल भारतीय मतदाता इतना जागरूक और तर्कसंगत भी नहीं कि सत्ता पक्ष के नेपथ्य में लिखी जा रही स्क्रिप्ट के मजमूं को समझे या अचानक से उंगुली करते विपक्ष के मनोभावों को ताड़ सके। अर्द्धसत्य पर गढ़े जाते चुनावी मुद्दों से लेकर विकास के लॉलीपॉप तक की यात्रा को वह एक बटन को दबा देने भर के अपने हक़ूक़ी फर्ज़ पर छोड़, रोज़ की दाल-रोटी के इंतजाम में अपना दिमाग खपाने से ही अपने कर्म की इतिश्री कर लेता हैं। यही है असल मतदाता जिसे फुसलाना हुक्मरानों को भलीभांति आता है। बाकी तो सेंटिग का खेल है।  


अब इस मतदाता की बात की जाए तो इसे अपनी असुविधाओं को वाणी देना नहीं कभी नहीं आया-विशेषकर शासक वर्ग के सामने और फिर जब आज जैसा शासकवर्ग हो तो उसे जनसेवक के मुख्यद्वार से आगे जाने की भी हिम्मत नहीं होती या कह लें उसके लिए 4 साल तक द्वार बंद होते है। उसकी विपदा ये है कि उसका तो राम भी यही है, रावण भी यही!

अब ऐसी भोली मूर्ख जनता को छलना कौन सी बड़ी बात है। ऐसी जनता को जगाना भी आसान नहीं होता क्योंकि इसके भी उसके तय मानक है। जैसे गत दिनों एक उबर डाइवर से, जिसका नाम अल्ताफ था, मैंने यूं ही चलते-चलते जिक्र छेड़ दिया कि भइया! चुनाव आ रहे है।

किस पार्टी को वोट देने का सोच रहे। इस बार तो आप पार्टी भी सारी सीटों से चुनाव लड़ रही और उसने बिजली 300 यूनिट तक फ्री देने की घोषणा भी कर दी है। तो उसका जबाब था कि, पहले तो देखेंगे कि हमारे इलाके में कौन उम्मीदवार खड़ा है। अब जिससे रोज़ का मिलना जुलना हो और हमारे काम भी आ रहा है तो बिला शक़ उसी को वोट देगें। लेकिन जैसा कि आपने कहा अगर कोई पार्टी हमारी रोज की जरूरतों पर इनायत फरमाने को तैयार है तो हम उसके बारे में सोच सकते है। 


यही है हमारी वह जनता जो ग़रीबी-रेखा से नीचे जी रही है। इनकी सोच यहीं तक सीमित है। किसी ने ठीक ही कहा है-जन क्रांतियां जन-जागृति से संभव है और उसकी आकांक्षा जनता के भीतर से उत्पन्न होती है। ऊपर से थोपी हुई क्रांतियां निष्फल रहा करती है। देखा ये गया है कि इस कार्य के लिए भी वह जिन निःस्वार्थ और बुद्धिजीवी समझे जाने वाले वर्ग की आवाज़ का सहारा लेकर वह अपनी पीड़ा को सत्ता के पीठासीन अधिकारी तक पहुॅंचाने की कोशिश करता है वह स्वंय ही राजाश्रय प्राप्त कर अपने स्वर्णजटित पिंजरे के भीतर से फड़फडाने का अभिनय मात्र करता है। इसका उदाहरण मीडिया से बेहतर और क्या होगा? सत्य कड़वा है लेकिन वर्तमान मीडिया इसी कर्म में लिप्त है। हालात ये है कि सालों से मूर्ख बनाई जाती जनता भी पांच साला सरकार के अंतिमवें वर्ष में विन्रमता की मूर्तियों में तब्दील होते नेताओं के दिव्य दर्शन की आदी हो चुकी है। जबकि इस तरह के कटाक्ष की आवश्यकता नहीं होती अगर सही मायनों में सत्ता हासिल होते ही जनता का हित एक पल को न भुलाया जाता। उन्हें बिजली-पानी-सड़क-भर पेट राशन जैसी मूल सुविधाओं के अधिकार को सहानूभूति की तरह न बांटा गया होता।


हालांकि चुनाव को सब चीजों का आदि और अंत मान लेना भी लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं। लेकिन अगले पांच साल की सत्ता के लिए कराये जाने चुनावों के विकृत हो चुके महत्व के कारण ही विधायक या सासंद पांच साल बाद ही अपना मुॅंह अचानक ही बार-बार दिखाने लगते है। जिस गरीब जनता को वह दुत्करते फिरते है उन्हीं की चरण वंदना की फोटो सोशल मीडिया पर नज़र आने लगती है। सरकार की नीतियां-परियोजनाएं की फाइल्स भी टुकड़ों में काम करती हैं। आज भूमि पूजन होगा तो साल भर बाद शिलान्यास फिर कहीं जाकर पांचवें साल में ग्राम्य या क्षेत्र विकास की एक झलक देखने को प्राप्त होगी। क्षेत्र में अचानक से सक्रिय होते मतदाताओं के संगठित तबके तक चुनावी ब्यार में अपनी फसल काटने को तत्पर हो जाते है। 

विडंबना ये है कि सारी फसाद की जड़ वह धारणा है जो दर्शाती है कि वोट देकर सरकार बनाना और वोट लेकर सरकार बनना ही लोकतंत्र की एकमात्र कार्रवाई भर है। भारतीय मतदाता एक बार वोट देने के बाद सरकार की तरफ ही टुकुर-टुकुर देखता रह जाता है कि अब जो करना है सरकार को ही करना है। जहां तक विपक्ष का सवाल है वह नुक्ताचीनी करने के अलावा खुद से कोई ठोस क़दम नहीं उठाता। सरकार की नाक़ामी पर थू-थू करना और प्रशंसनीय कार्य को चुनावी हथकंडा कह देना बड़ी सहजता से हो जाता है। कोरोना के ग्रहण के समय जब दोनों पक्षों को एक साथ काम करना चाहिए था तो घरों में अपनी जान बचाते विपक्षी सरकार की व्यवस्था पर तंज कस रहे थे। लंबे समय से सत्ता की पारी खेलते लोगों को अगर ये बताना पड़े कि कब बोलें और कब चुप रहे तो यह भारतीय राजनीति के लिए शर्मनाक है। सत्ता पक्ष के हर कार्य सराहनीय हो जरूरी नहीं लेकिन विपक्ष की उठती हर उंगुली भी उचित हो ये भी सही नहीं। और न ही दोनों पक्षों के लिए यह भूलना सराहनीय कहा जाएगा कि जिस जनता से वे सत्ता सुख भोग रहे उसे अपने मात्र स्वार्थवश याद किया जाये। 


विकास की मीनारें और संसाधनों के भंडार किसे नहीं लुभाते। लेकिन मुझे लगता है कि विश्व विकास की होड़ में अपनी हैसियत से ज्यादा उसका ऐसा पहाड़ खड़ा करने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए कि आम आदमी का दम घुटने लगे।

आखिर बोझ तो घूम-फिर कर उसी पर आता है। आवश्यकता देश के हर नागरिक को सेहतमंद और खुशहाल रखने की होनी चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि उसकी बेसिक आवश्यकताओं का टोटा न हो। स्वास्थ्यवर्धक और सस्ते अनाज उसका मौलिक अधिकार हो। चिकनी सड़कें, अनवरत बिजली सप्लाई और स्वास्थ्यवर्धक पानी हर वर्ग की सुविधा का एकमात्र लक्ष्य माना जाए। सुस्ंास्कारी शिक्षा देने का मानक सभी के लिए एक जैसा हो। भयरहित समाज की कल्पना मात्र कोरी न लगे। गरीब के लिए अन्न भंडार और भोजन केन्द्र की बात फाइलों से बाहर हक़ीकत में उतरे। जाति भेद वर्णभेद की रोटी सेंकने के बजाए ऐसा देश काल हो जो दूसरों के लिए मिसाल बनें।


ऐसे रामराज्य की कल्पना आज के सत्ताभोगियों के बीच करना बेमानी है। रामनामी दुपट्टे में लिपटी सत्ता मंदिर तो बना देगी लेकिन पेट की बढ़ती ज्वाला को मंहगाई से लगी आग से राख में बदलने से न रोक पाएगी। वोटर को महज मजहब के चश्में से देखने वाली सत्ता अधिक दिन मजहबी टोपी के सहारे जनता को मूर्खता के वायदों की चाशनी न खिला सकेगी और न ही दलित उत्थान के नाम पर फक़त झूठ का घोल पिलाने वाली सत्ता बराबरी का दर्ज़ा या सामाजिक परिवर्तन की बयार ला सकेगी। कुल मिलाकर बात ये है कि कोई भी पार्टी एक चुनाव जीतकर जनता के सिर पर बैठ जाए और अपनी मनमर्जी करने लगे ये अधिकार उसको नहीं दिया जाना चाहिए। जब तक जनता और नागरिक संस्थाएं अपनी जिम्मेदारियों को नहीं समझेगी या लोगों को संगठित कर, इन पांच साल के लिए शासक बन बैठे माननीयों के खिलाफ, कोई सीधी कारवाई करेगीं तब तक कुछ नहीं हो सकेगा। और सरकार किसी की भी बनें, वह तो वहीं करेगा जो उसको रास आता है।


इसलिए मेरा मानना है कि जनता को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि वह इस चुनावी रण में वह कृष्ण है जो दोनों पक्षों को सबक सिखाने मैदान में उतर रहा है और वह ही अर्जुन भी जो अपनी तर्जनी के उपयोग से लक्ष्य भेद भी कर रहा है। मतदान का ये एक दिन सिर्फ उसका और उसका है। उसे अपने भारतीय होने पर गर्व होना चाहिए। हर धर्म-मज़हब-जाति-वर्ण से उठकर अपनी भारतीयता की जात को ऊपर रखना चाहिए। कही-गढ़ी या बुनी गई बातों में भेद कर तर्कसंगत चयन द्वारा ही अपने चुनावी अधिकार का उपयोग करना सीखना होगा। तभी वह एक जागरूक मतदाता का फर्ज निभा सकेगे। अगर उसे लगता है उसके साथ गत पांच साल में छल-कपट किया गया है तो इस अनृत से अनर्थ की यात्रा का हिसाब बराबर करने का यही उचित समय है।

रेखा पंकज, वरिष्ठ पत्रकार

(यह लेखिका के निजी विचार हैं)

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