लोकपाल और लोकायुक्त के साथ मोदी सरकार ने क्या किया?

अन्ना आंदोलन का एक दशक होने वाला है. आठ-नौ साल लोकपाल और लोकायुक्त एक्ट को संसद से पास हुए बीत चुके हैं, लोकपाल अधिनियम अधिसूचित होने के कुछ ही महीनों बाद 2014 में मोदी सरकार सत्ता में आ चुकी थी लेकिन पहला लोकपाल नियुक्त करने में उसे करीब पांच साल लग गए. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज पिनाकी चंद्र घोष को देश का पहला लोकपाल बने हुए एक साल से कुछ अधिक समय हो चुका है लेकिन संस्थान अभी भी अपनी स्वाभाविक रंगत में नहीं दिखता है.

लोकपाल और लोकायुक्त का क्या फाएदा हुआ? क्योंकि राजनीतिक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार पर नकेल कसने की लड़ाई में भारत और पीछे छूटता जा रहा है. क्योंकि भ्रष्टाचार और सरकारी कामकाज में पारदर्शिता से जुड़े सूचकांकों और सर्वे रिपोर्टों में भारत का प्रदर्शन फीका ही रहा है. ट्रांसपेरंसी इंटरनेशनल की रिपोर्टों को ही लें. जनवरी में जारी करप्शन परसेप्शन इंडेक्स में भारत 180 देशों की सूची में 80वें नंबर पर था. चीन का भी यही नंबर है और पाकिस्तान 120वें नंबर पर है. अगर पिछले पांच साल में इस सूचकांक के लिहाज से भारत का प्रदर्शन देखे तो उसमें गिरावट ही आई है. 2015 में उसकी रैंक 76 थी, 2016 में 79, 2017 में 81, 2018 में 78 और 2019 में 80 थी.

लोकपाल और लोकायुक्त एक्ट को संसद में पास हुए आठ-नौ साल हो गए हैं. लेकिन ये कानून कारगर साबित नहीं हो रहा है. भ्रष्टाचार की शिकायतें दर्ज करने के लिए एक समुचित फॉर्मेट बनने में ही लंबा समय लग गया. फिलहाल ‘नॉट सिक्योर’ लोकपाल वेबसाइट में फॉर्मेट के अधिसूचित होने की सूचना-पट्टी स्क्रॉल में चल रही है. लोकपाल के गठन के एक साल से अधिक समय बीत जाने के बाद उसकी वेबसाइट को देखते हुए भी आप संस्था के ताजा सूरतेहाल का एक मोटा अनुमान लगा सकते हैं. भ्रष्टाचार निरोधी कानून में 2018 में हुए संशोधनों के बाद यह स्पष्ट नहीं है कि लोकपाल के न्यायाधिकरण से उसका तालमेल कैसे होगा. दूसरी बात यह है कि लोकपाल बिल के एक साल बाद व्हिसलब्लोअर्स प्रोटेक्शन ऐक्ट आया था लेकिन इसमें लोकपाल का उल्लेख ही नहीं है. इनमें भी संगति लाने की जरूरत है.

कुल मिलाकर ये तीनों कानून तो एक सूत्र में पिरोए जाने चाहिए. सवाल सीबीआई का भी है, वो ‘तोता’ ही बना रहेगा या लोकपाल के अधीन उसे कुछ स्वायत्ताएं हासिल होंगी? अगर सीबीआई लोकपाल के दायरे में नहीं रखी जाती तो फिर लोकपाल के लिए जांच और कार्रवाई का काम कौन करेगा? और फिर सीबीआई या सीवीसी की भूमिका क्या रह जाएगी- बहुत से सवाल हैं जिनके जवाब स्पष्ट रूप से नहीं मिल पाए हैं.

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