म म म.. मीडिया, हमरी न मानो ‘बजजवा’ से पूछो

क क क… किरण, इस एक डॉयलॉग ने शाहरूख को बॉलीवुड का शहंशाह बना दिया. दरअसल सलमान खान की क्रश थी उनकी इंग्लिश टीचर किरण. जब वह पढ़ाने आतीं तो सलमान उसकी खूबसूरती में इस कदर डूब जाया करते कि हकलाने लगते. और कई बार यही डॉयलॉग बोलते. नतीजतन उस टीचर के पढ़ाने के बावजूद सलमान की अंग्रेजी नहीं सुधरी. बातों बातों में सलमान ने यह राज शाहरूख के सामने उगल दिया. और शाहरूख ने इस आइडिया को बहुत करीने से फिल्म ‘डर’ में बेच दिया.

अब आई बात समझ में… जो डर गया, समझो मर गया. फिल्म ‘शोले’ में गब्बर का यही डॉयलाग था न? अमूमन बातचीत के दौरान सीना उतान कर इसे ही बार बार दोहराया जाता है. बल्कि बूस्टर डोज भी दिया जाता है. डर के आगे जीत है. जबकि सच्चाई इसके उलट है. कभी आपने सोचा है कि मनुष्य डरना छोड़ दे तो क्या होगा? अरबों खरबों का बना बनाया धंधा चौपट हो जाएगा. दुनिया भर की दुकानें बंद हो जाएंगी. और कई अरबपतियों के हाथों में कटोरा आ जाएगा. सो कॉल्ड विकास की कलई खुल जाएगी. साठ के दशक में पत्रकार वेंस पैकर्ड ने अपनी किताब ‘द हिडेन परस्वेडर’ के जरिए विज्ञापन की दुनिया की रहस्यमय कलाओं का खुलासा बखूबी किया था. इस किताब में बताया गया है कि कैसे अपनी बेहूदी साजिशों के बूते कोई अपने उत्पाद खरीदने के लिए उपभोक्ताओं पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाता है या डराता है.

जी हां, इस दुनिया का पूरा कारोबारी साम्राज्य हमारे इस डर की बुनियाद पर ही तो खड़ा है. यकीन नहीं हो रहा? टीवी स्क्रीन पर जब क्राइम शो प्रेजेंट करते वक्त एंकर चिल्लाता है कि चैन से सोना है तो जाग जाओ… अबे लल्लू, जब जाग ही जाएंगे, तो चैन से भला कैसे सो सकते हैं? सच्चाई सिर्फ यह है कि उसे अपनी टीआरपी बढ़ानी है. इसलिए आप जाग जाइए. जरूरत पड़े तो इसके बाद नींद की दवा खरीद कर खाइए.

ठीक यही रवैया अख्तियार करते हैं न्यूज पोर्टल और अखबार वाले. वे भी बखूबी डर को ही प्रमोट करते हैं. जरा हेडिंग पर गौर फरमाइए – 30 जून तक अगर आपने ऐसा नहीं किया तो… यह डॉयलाग उसी प्रजाति का है, जिसमें रात के आठ बजे आपको अचानक बताया जाता है कि आज रात बारह बजे…. अब पूरी मीडिया इंडस्ट्री इस फिल इन द गैप से अपनी रोजी रोटी चलाती है. बल्कि जिस दिन रात के आठ बजे जैसा कुछ होना होता है, मीडिया तड़के ही बाग देना शुरू कर देती है.

उद्योगपतियों के आंगन में किलकारी भरने वाली “सो कॉल्ड मेनस्ट्रीम मीडिया” के पास लोकतंत्र की भी ऑथोराइज्ड एजेंसी है. इसलिए जैसे धर्म, संस्कृति, देश और मानव सभ्यता रेग्युलर इंटरवल पर खतरे में आती रहती है, ठीक वैसे ही डेमोक्रेसी के सर पर भी संकट के बादल मंडराने के डेमो आपको दिखाए जाते रहते हैं. अगर ऐसा नहीं होगा तो आप डेमोक्रेसी की इस दुकान की महत्ता को भला कैसे समझेंगे? वाराणसी में फ्लाईओवर हादसा होने पर आपको ग्रहों के त्रिकोण को ज़िम्मेदार कौन बताएगा? अक्षय तृतीया को गहने खरीदने जरूरी है और वैलेंटाइन वीक में इलू इलू कैसे करना है, आपको कौन समझाएगा?

न्यूज चैनलों पर जितने बाबा लोग आपका घंटों भेजा फ्राई करते मिलते हैं, उनमें अधिकतर पेड प्रोग्राम पेश करते हैं. वह एक तरह से हिडेन विज्ञापन ही होता है. जिसका मकसद आप बेहतर समझ सकते हैं. अगर बाबाओं के प्रवचन न हो तो कई अखबारों के शटर गिर जाएंगे. एक लोकल चैनल पर राशिफल बांचने और लाइव भविष्य बताऩे वाले पंडी जी से मैंने एक दिन आफ एयर पूछा – पंडी जी, इस चैनल का बोरिया बिस्तर कब तक गोल हो जाएगा? वे बगले झांकने लगे. ऐसा नहीं है कि जो डराता है वह खुद नहीं डरता है. उन्हें भी डराने वाला कहीं बैठा उनके लिए सस्पेंस थ्रिलर स्टोरी प्लान करता रहता है.

एक अखबार का नया एडिशन लांच हुआ, मगर मार्केट नहीं पकड़ रहा था. फिर उसकी दूसरी यूनिट के जीएम साहब पहुंच गए. किसी दिव्य ज्ञानी को लेकर. कभी किसी बाजार विशेषज्ञ से पूछिएगा कि इस देश में काल सर्प योग का कारोबार कितने करोड़ का है? एक स्टोरी लिखते वक्त मुझसे दिल्ली के एक ज्योतिष ने ही बताया था कि सिर्फ राजधानी में यह कई करोड़ का कारोबार है.

बचपन में जो पहला हिंदी अखबार मेरे हाथ में आया था उसके रविवारीय परिशिष्ट में अमूमन लीड स्टोरी हुआ करती थी, जब प्रेत ने चलाया हेलीकॉप्टर टाइप. धीरे धीरे सस्पेंस थ्रिलर का चस्का लग गया. रामसे ब्रदर्स की फिल्में भी देखने लगा. बॉलीवुड और हॉलीवुड को जिंदा रखे हुए है यह डर का कारोबार. जेम्स बॉन्ड सीरीज के बॉक्स आफिस कलेक्शन आपको बताएंगे कि इस दुनिया में डर का कारोबार किस हद तक पैठ बना चुका है. टीवी न्यूज इंडस्ट्री तो इसके बगैर विधवा जाएगी. इसीलिए हर दूसरे तीसरे दिन एक नया दुश्मन अवतार ले लेता है. 2000 के नए नोट में नैनो GPS चिप खोजना इसी डराओ अभियान का हिस्सा था. इसके बाद सोशल मीडिया पर लोग मोर्चा संभाल लेते हैं. अगर बीच बीच में नया दुश्मन न पैदा होता रहे तो जुकरबर्ग की बगिया में भी कम्पलीट लॉकडाउन हो सकता है.

आपने कभी सोचा है हमारी और देश की सुरक्षा की गांरटी देने वाला खुद क्यों सुरक्षा इंतजामात के बीच अभेद्य किले में रहना पसंद करता है? ज्यादातर राजनेताओं का सपना होता है चाक चौबंद सुरक्षा इंतजामात. यह सिर्फ उनका स्टेट्स सिंबल ही नहीं होता. कई तो घिघियाते हैं कि उनकी जान को खतरा है, उन्हें सुरक्षा मुहैया करवाई जाए. चुनाव में तो यह भी मुद्दा होना चाहिए कि तुम्हें क्यों डर लग रहा है? क्या तुम्हें इस कानून व्यवस्था पर भरोसा नहीं है? तो फिर आम नागरिक कैसे खुद को सुरक्षित महसूस करे. उसे तो क्रिमिनल कौन कहे, पुलिस वाले भी दौड़ा लेंगे. जब जब तुम्हारा आदेश होता है लठिया भी देते हैं.

उत्तर कोरिया के सनकी तानाशाह किम जोंग-उन को चाक चौबंद सुरक्षा के बीच तो आपने टीवी पर देखा ही होगा. अब जरा उसकी मनःस्थिति का अनुमान लगाइए. अमरीका के जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के विजिटिंग स्कॉलर हैं माइकल मैडन. मैडन नॉर्थ कोरिया लीडरशिप वॉच के डायरेक्टर भी हैं, उन्होंने कई रहस्यों पर से पर्दा हटा दिया है.

FICCI की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में सुरक्षा का निजी कारोबार (डर का कारोबार) 2022 तक करीब 1 लाख करोड़ तक पहुंच जाएगा. कल्पना कीजिए जिस देश में कानून व्यवस्था के नाम पर सरकारें बनती और पलटती हैं, उसमें निजी कारोबार की भी कितनी गुंजाइश बचाए रखी जाती है. एक दूसरी रिपोर्ट बताती है कि भारत में सुरक्षा गैजेट्स मसलन CCTV कैमरा, बायोमैट्रिक सिस्टम का कारोबार इस साल करीब 18 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच जाने की उम्मीद है. वैसे यह डाटा कोरोना की देश में एंट्री से पहले का है. पहले सोसाइटी के गेट पर गार्ड लगाए गए, फिर सीढ़ियों और बालकॉनी में सीसीटीवी. अब तो बेडरूम में भी सीसीटीवी की सुगबुगाहट है. क्या कीजिएगा डर को हम कंट्रोल नहीं कर पा रहे हैं. ऊपर से मीडिया वाले स्टोरी को इतना ट्वीस्ट कर देते हैं कि हमें सपने भी डरावने आने लगते हैं. वैसे डरावने सपनों का फल निहितार्थ भी बीच बीच में मीडिया वाले छापते या बताते रहते हैं.

अगर आदमी के मन में डर न हो तो मेडिकल इंडस्ट्री भी टें बोल जाएगी. इसलिए जब जब वह वेंटिलेटर पर जाती है, या एक्सपेंसन के लिए नया स्कोप तलाशा जाता है, कुछ नया इजाद हो ही जाता है. बोरे के नमक खाकर मेरी पीढ़ी के ज्यादातर लोग जवान हुए. मगर अचानक उसे बीमारी का कारक बता दिया गया. मीडिया में इस तरह की स्टोरी जमकर लिखी और छापी गई. देखते ही देखते कुछ दिन बाद मल्टीनेशनल कंपनियों का नमक मार्केट में छा गया. देखते ही देखते सहज सर्वसुलभ पानी और हवा डीजल और पेट्रोल से होड़ लेने लगी. कलकत्ता के एक बुजुर्ग कभी बताए थे कि सुनियोजित ढंग से साठ के दशक में इस देश में मां के दूध को लेकर भ्रामक खबरें फैलाई गईं. ताकि डिब्बा बंद दूध बेचा जा सके. हालात इस कदर बिगड़ गए कि नियंत्रण से बाहर हो गए. आज सरकार होर्डिंग बैनर लेकर घूम रही है कि मां का दूध नवजात का सर्वोत्तम आहार है. जनता को जागरूक करने के लिए करोड़ों का विज्ञापन छापा जाता है. सच्चाई तो यह है कि क्रीमीलेयर जब तक डॉक्टरों का सेफ जोन बना रहेगा, तब तक मर्ज लाइलाज रहेंगे.

तमिलनाडु पुलिस की कस्टडी में जेयराज और बेनिक की संदिग्ध हालात में मौत हो जाती है. सोशल मीडिया और मेनस्ट्रीम मीडिया में जो सूचनाएं आ रही हैं वह पिता-पुत्र की नृशंस हत्या के संकेत दे रही हैं. प्रकारांतर में इसे आप यूं भी कह सकते हैं कि आपको कोरोना न मार पाए इसलिए सिस्टम मारने के लिए तैयार बैठा है. यह सब कुछ अचानक नहीं होता है. इसके लिए पूरा होमवर्क किया जाता है. मीडिया पृष्ठभूमि तैयार करती है. पिछले दो तीन महीने में आम लोगों के कमेंट और पोस्ट पर जरा नजर दौड़ाइए. ठीक ठाक तादाद में लोग आपको पुलिस राज की हिमायत करते नजर आएंगे. सीधे सीधे सार्वजनिक तौर पर आह्वान किया गया कि सड़कों पर निकलने वाले लोगों पर लाठियां बरसाइए. क्योंकि खाए पीए अघाए लोग मारे डर घरों में दुबक चुके थे. सोशल मीडिया पर टाइम पास करने का जुगत तलाश रहे थे.

हमारी पुलिस व्यवस्था अंग्रेजों से विरासत में मिली है. आप खुद नहीं चाहते कि वह डेमोक्रेसी के मुताबिक काम करे. चुनाव लड़ना होता है तो आप जन नेता बन सड़कों की खाक छानने लगते हैं. जब वोटरों पर किसी महामारी ने हमला बोला तो विपत्ति की घड़ी में आप खुद सबसे पहले घरों में दुबक गए. आप खुद डर गए. तो फिर वोटरों को सड़कों पर न निकलने के लिए सचेत कौन करेगा? पुलिस का डंडा? क्या क्या पुलिस से करवाएंगे आप? सथनकुलम में जो कुछ अमानवीय हुआ, सिंघम जैसी फिल्म सीरीज बनाने वाले डायरेक्टर हरी का भी कलेजा कांप उठा. वैसे एक सहज स्वाभाविक प्रश्न आपके दिमाग आता ही होगा. जब झाडू से कूंच कर तिलचट्टे मारे जा सकते हैं तो आदमी क्यों नहीं?

याद कीजिए हैदराबाद में महिला डॉक्टर के साथ रेप करने के बाद जिंदा जला देने की वारदात को. इस मामले के चारों आरोपी वारदात के रिक्रिएशन के वक्त पुलिस मुठभेड़ में ढेर हो गए. वे पुलिस अफसर बहुतेरों के लिए सिंघम बन गए. आखिर इस हद तक एक लोकतांत्रिक नागरिक कैसे पहुंच गया. क्योंकि हमारी व्यवस्था ने आम लोगों में इतना डर बैठा दिया है कि वह इस नतीजे पर पहुंच गया. कि अब न्याय ऐसे ही मिलेगा.

इसी देश में निर्भया प्रकरण भी हुआ था. रिकॉर्ड टाइम में आरोपियों को सलाखों के पीछे ही नहीं, फांसी के तख्ते तक पहुंचाने वाली छाया शर्मा और उनकी पुलिस टीम क्या कायर थी? तुलना कीजिए इस तरह के प्रकरण में दिल्ली पुलिस और हैदराबाद पुलिस के रवैये को. हमारी मीडिया ने किस अंदाज में इसे परोसा? उसी का नतीजा है तमिलनाडु प्रकरण. मीडिया का मूल कर्तव्य है आम नागरिकों को सजग और सचेत करना. मगर वह खुद डरा रहता है. एक डरी हुई मीडिया और डरे हुए पत्रकार से आप क्या उम्मीद करते हैं.

कन्हैया लाल नंदन (साम्सा का सपना और काफ्का का शहर) लिखते हैं कि कितना भयानक सच है, आदमी का तिलचट्टे में बदलना और उसका अनवरत यंत्रणा, तिरस्कार और अपमान में जीते हुए घुटकर एक दिन दम तोड़ देना. ऐसा भयानक सच दहशत पैदा करता है, लेकिन काफ्का अपने पूरे लेखन में हमें ऐसे भयानक सच के साक्षात्कार कराते हैं. व्यापारी ग्रेगोर साम्सा, कैसे एक महाकाय तिलचट्टे में बदलकर किस भयंकर यातना में मरता है, वहीं खड़े खड़े महसूस होने लगता है. तमाम सारी टांगों पर रेंगता हुआ एक वृहदाकार तिलचट्टा अपनी कोठरी से बाहर निकलता है और परिवार के लोगों के हिकारत भरी आंखों का शिकार वह फिर से उसी कोठरी में बंद कर दिया जाता है. जहां अपमानित और निराश वह सो नहीं पाता और अंततः उसके प्राण उसका साथ छोड़ जाते हैं.

इसमें कोई शक नहीं है कि डर आदमी से कुछ भी करवा सकता है. इस बात को बाजार, विज्ञापनदाता और मीडिया से बेहतर भला कौन समझ सकता है. मार्केटिंग की दुनिया हमें एंटीडिप्रेसेंट्स से लेकर कंडोम, डेंटल से लेकर कपड़े धोने वाले डिटर्जेंट, बर्गर अलार्म से लेकर मोबाइल तक, बोतलबंद पानी से लेकर पिज्जा, साथ ही अनगिनत अन्य ब्रांड्स और प्रोडक्ट्स तक सब कुछ बेचने के लिए डराती है. अर्थात डर एक एवरग्रीन बिकाऊ कांसेप्ट है. पेप्सी और कोक के तो ज्यादातर विज्ञापन डरावने स्टंट ही होते हैं. मर्द होकर औरतों वाले क्रीम लगाते हो, ठग हमारी निजता में कहां तक सेंध लगा चुके हैं आपको पता भी है?

फिर डर की कोई लिमिट भी नहीं है. ओशो कहते हैं अपने अराजक बेटे से परेशान कोई महिला एक संत के पास पहुंची. उसने संत से कहा कि उसका बेटा मन बढ़ हो गया है, उसकी कोई बात नहीं सुनता. वह उसे डराए ताकि वह उसका कहा माने. संत अचानक उग्र हो गए, जोर जोर से विक्षिप्त की मानिंद चीखने चिल्लाने लगे. संत के तेवर देख डर के मारे उक्त महिला का बेटा भाग खड़ा हुआ. थोड़ी देर में वह महिला भी डर से बेहोश हो गई. कुछ देर बाद संत सामान्य स्थिति में वापस लौटे. महिला को भी होश आया. संत से उस महिला ने पूछा कि आपने ऐसा क्यों किया, लड़के को डराने के लिए कहा था, आपने मुझे ही डरा दिया? संत का जवाब था डर का भी कोई ओर छोर होता है क्या?

इसी न्यू इंडिया के कांसेप्ट के साथ हम विश्व गुरु बनने निकले हैं. पोथी की जगह ढाई आखर में प्रेम को निचोड़ देने वाले कबीर को भी हम केवल बांचते हैं. नहीं दान है, नहीं दक्षिणा खाली हाथ चली आयी, पूजा की विधि नहीं जानती, फिर भी नाथ! चली आयी. सुभद्रा कुमारी चौहान को पढ़ कर जवान हुई पीढ़ी आज न्यू जेनरेशन को संस्कारित करने का जिम्मा संभाल रही है. आप आश्वस्त रहे मनुष्य के पास असीम क्षमता है, किसी भी स्थिति से तालमेल बनाने की. केवल मनुष्य और तिलचट्टे में तालमेल करने की अपरिसीम क्षमता होती है. इसीलिए इस दुनिया में जहां आदमी मिलेगा, वहां तिलचट्टा जरूर मिल जाएगा. बहुत जल्द आपको मीडिया तिलचट्टे के दूध से बने सुपर फूड को परोसने वाली है.

बकौल फ्रेंज काफ्का “हर क्रांति भाप बन कर उड़ जाती है और पीछे एक नई नौकरशाही का कीचड़ छोड़ देती है”.

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विजय शंकर पांडे, वरिष्ठ पत्रकार

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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