अरुण जेटली : AVBP से लेकर AIIMS में आखिरी सांस लेने तक

अरुण जेटली का शनिवार को निधन हो गया. वो 67 साल के थे और लंबे समय से किडनी की बीमारी से पीड़ित थे. बीते नौ अगस्त से अरुण जेटली एम्स में इलाज करा रहे थे. एम्स की प्रवक्ता आरती विज ने मीडिया के लिए जारी प्रेस रिलीज में बताया है कि जेटली ने शनिवार को दोपहर 12 बजकर सात मिनट पर अंतिम सांस ली.

अरुण जेटली बीजेपी ने इन नेताओं में शुमार होते थे जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खासमखास माने जाते थे. इमरजेंसी में छात्र राजनीति से लेकर मोदी सरकार में वित्त मंत्री बनने तक अरुण जेटली ने राजनीति को करीब से देखा था. 25 जून 1975 की बात है जब दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष अरुण जेटली अपने नारायणा वाले घर में थे और उन्हें गिरफ्तार करने के लिए पुलिस उनके घर आई थी. उस वक्त पुलिस से बचने के लिए उन्हें भागना पड़ा था. लेकिन अगले दिन यानी 26 जून को सुबह साढ़े दस बजे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के करीब 200 छात्रों को इंदिरा गाँधी का एक पुतला जलाने के कारण गिरफ्तार कर लिया गया था. अरुण जेटली ने उस वक्त सरकार के विरोध में एक जोरदार भाषण दिया था.

उस वक्त अरुण जेटली को तिहाड़ जेल में बंद किया था. जेल की जिस सेल में जेटली बंद थे वहां अटलबिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी और के. आर. मलकानी के अलावा 11 और राजनीतिक कैदी थे. जेल जाने का जेटली को काफी फायदा हुआ. और जब जेटली जेल से रिहा हुए तो उन्होंने राजनीति को पूरी तरह से अपना लिया. बताते हैं कि अरुण जेटली को फिल्में देखने का बहुत शौक था. ‘पड़ोसन’ उनकी पसंदीदा फिल्म थी जिसे उन्होंने कई बार देखा था. अरुण जेटली के साथ पढ़ने वाले उनके दोस्त बताते हैं कि कॉलेज में वो काफी शर्मीले थे. वो मंच पर लंबे लंबे भाषण तो दे लेते थे लेकिन मंच से उतरते ही वो शेल में चले जाते.

1977 में वाजपेयी उन्हें चुनाव लड़ाना चाहते थे

बता 1977 की है, ये वो वक्त था जब जनता पार्टी थी. अरुण जेटली को जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्य समिति में रखा गया. उस वक्त अटल बिहारी वाजपेयी चाहते थे कि अरुण जेटली 1977 का लोकसभा चुनाव लड़ें लेकिन उनकी उम्र चुनाव लड़ने की न्यूनतम सीमा से एक साल कम थी. लिहाज वो उस साल चुनाव नहीं लड़ पाए. इसके बाद अरुण जेटली ने अपनी कानून की पढ़ाई पूरी करने का फैसला किया. कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद वो फिर राजनीति में आए.

कांग्रेस के बड़े नेता की बेटी से हुई थी शादी

कम ही लोगों को पता होगा कि अरुण जेटली की शादी कांग्रेस के बड़े नेता से हुई थी. अरुण जेटली की पत्नी का नाम संगीता डोगरा है जो कांग्रेस के बड़े नेता गिरधारी लाल डोगरा की बेटी हैं जो दो बार जम्मू से सांसद और जम्मू कश्मीर सरकार में भी मंत्री रहे थे. जेटली की शादी में अटलबिहारी वाजपेयी और इंदिरा गाँधी दोनों शामिल हुए थे. जेटली जब वकालत किया करते थे तो वो देश के चोटी के वकीलों में शुमार होते थे और उनकी फीस काफी ज्यादा थी. जेटली को हमेशा महंगी गाड़ियों ने आकर्षित किया.

खाने के शौकीन जेटली भटूरों के मुरीद थे

जेटली पूरी जिंदगी खाने के दीवाने रहे. दिल्ली के सबसे पुराने क्लबों में से एक रोशनारा क्लब का खाना उन्हें बहुत पसंद था. कनॉट प्लेस के मशहूर ‘क्वॉलिटी’ रेस्तराँ के चने भटूरों के वो ताउम्र मुरीद रहे. जेटली ने दिल्ली की स्वादिष्ट जलेबियाँ, कचौड़ी और रबड़ी फ़ालूदा खाते हुए अपनी राजनीति पारी की शुरुआत की थी और राजनीति के उरूज पर पहुंचकर भी वो इन्हें नहीं भूले. हालांकि डायबिटीज होने के बाद उनका खाने का शौक खत्म सा हो गया था लेकिन फिर भी वो कभी कभार अपने मन का खा लिया करते थे.

बजट भाषण पढ़ते वक्त जब बिगड़ी तबीयत

2014 में बजट भाषण पढ़ते वक्त उनकी तबीयत खराब हो गई थी जिसके बाद उन्होंने लोकसभाध्यक्ष से बैठकर भाषण पढ़ने की अनुमति माँगी. लोकसभा में बजट भाषण पढ़ने का नियम तो ये है कि वित्त मंत्री खड़े होकर भाषण पढ़ेंगे. लेकिन सुमित्रा महाजन से उन्हें बैठ कर भाषण पढ़ने की खास अनुमति दी थी. उस वक्त दर्शक दीर्घा में बैठी हुई उनकी पत्नी बैठी हुई थीं और उन्हें अंदाजा हो गया था कि अरुण जेटली की पीठ में दर्द हो रहा है क्योंकि वो बार बार अपनी पीठ छूने की कोशिश कर रहे हैं.

बोफोर्स में निभाई थी महत्वपूर्ण भूमिका

ये बात है उस वक्त की जब वीपीस सिंह सत्ता में आए थे. ये साल 1989 की बात है. उस वक्त जेटली की उम्र महज 37 साल और वो भारत के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल बने थे. जनवरी 1990 से जेटली इनफ़ोर्समेंट डायरेक्टरेट के अधिकारी भूरे लाल और सीबीआई के डीआईजी एम. के. माधवन के साथ बोफ़ोर्स मामले की जाँच करने कई बार स्विट्ज़रलैंड और स्वीडन गए लेकिन आठ महीने बाद भी उनके हाथ कोई ठोस सबूत नहीं लगा. इसके बाद एक सांसद ने उनके ऊपर एक कटाक्ष किया था.

टेलीविजन आने के बाद बढ़ा जेटली का कद

90 के दशक में जब टेलीविजन आया तो समाचारों ने भारतीय राजनीति के स्वरूप को बदल दिया. जैसे जैसे टेलीविज़न की महत्ता बढ़ी, भारतीय राजनीति में अरुण जेटली का क़द भी बढ़ा. साल 2000 की बात है जब ‘एशियावीक’ पत्रिका ने जेटली को भारत के उभरते हुए युवा नेताओं की सूची में रखा. उसने उनको भारत का आधुनिक चेहरा बताया जिसकी छवि बिल्कुल साफ थी. उसी दौरान उनकी दोस्ती नरेंद्र मोदी से हुई. 1999 में उन्हें अशोक रोड के पार्टी मुख्यालय के पास एक सरकारी बंग्ला दिया गया था लेकिन उन्होंने वो बीजेपी नेताओं को दे दिया था.  

जब जेटली ने मोदी को दी तरजीह

अटल सरकार में जेटली उन नेताओं में शामिल थे जिन्होंने मोदी को उस वक्त सबसे ज्यादा तरजीह दी थी. 1995 में जब गुजरात में बीजेपी सत्ता में आई और नरेंद्र मोदी को दिल्ली भेज दिया गया तो जेटली ने उनको हाथोंहाथ लिया. उस समय के पत्रकारों का कहना है कि उस ज़माने में मोदी अक्सर जेटली के कैलाश कॉलोनी वाले घर में देखे जाते थे. कहते हैं जेटली बीजेपी के मुखिया इसलिए नहीं बनपाए क्योंकि उनके साथ एलीट होने का तमगा लगा हुआ था. इसका उन्हें एक तरह से राजनीतिक नुक़सान भी हुआ. उनकी आधुनिक और संयत छवि उनकी पार्टी की पुरातनपंथी और ‘हार्डलाइन’ छवि से कभी तालमेल नहीं बैठा पाई और उन्हें पार्टी में हमेशा शक की निगाह से देखा गया. इतनी ही नहीं जेटली आरएसएस के इनसाइडर भी कभी नहीं बने. जेटली के बारे में तो यहां तक कहा गया कि वो एक गलत पार्टी में सही व्यक्ति हैं.

जेटली के पास नहीं था जनाधार

अरुण जेटली के पास अपना कोई जनाधार नहीं था. क्योंकि वो हमेशा राज्यसभा से चुनकर आते थे. बहुत अच्छे वक्ता होने के बावजूद तगड़ा जनाधार न होने की वजह से जेटली उन ऊँचाइयों तक नहीं पहुंच पाए जिनकी उनसे अपेक्षा थी. संसद में उनका प्रदर्शन शानदार रहता था. और लोग उन्हें भावी पीएम के तौर पर भी देखते थे लेकिन जनाधार न होने उनकी राह में रोड़ बना रहा. 2005 जुलाई से उन्हें बीमारी ने पकड़ लिया. क्योंकि इसी साल अरुण जेटली की ट्रिपल बाईपास सर्जरी से गुजरना पड़ा.

2014 में जेटली उन नेताओं में शामिल थे जिन्होंने नरेंद्र मोदी के नाम को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाने के लिए सहमति दी थी. वाजपेयी के ज़माने में जेटली को हमेशा आडवाणी का आदमी समझा जाता था लेकिन 2013 आते-आते वो आडवाणी कैंप छोड़कर पूरी तरह से नरेंद्र मोदी कैंप में आ चुके थे. 2002 में गुजरात दंगों के बाद जब वाजपेयी ने मोदी को ‘राज धर्म’ की नसीहत दी थी तो जेटली ने न सिर्फ़ मोदी का नैतिक समर्थन किया था बल्कि उनके पद पर बने रहने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. 2014 में अमृतसर से लोकसभा का चुनाव हार जाने के बाद भी नरेंद्र मोदी ने न सिर्फ़ उन्हें मंत्रिमंडल में रखा , बल्कि उन्हें वित्त और रक्षा जैसे दो बड़े मंत्रालयों की ज़िम्मेदारी भी दी.

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