पानी की तरह बहती है दौलत चुनाव में…

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पानी की तरह बहती है दौलत चुनाव में. यह अक्षरशः सच भी है. मगर नई सदी में चुनाव और उसके तौर तरीकों में बहुत कुछ बदला है. विशेष तौर पर प्रचार के तौर तरीकों में बड़ा बदलाव हुआ है. इस बार के चुनाव प्रचार में कॉरपोरेट फंडिंग का पैसा सर चढ़ कर बोल रहा है.

दिल्ली के सदर बाजार में 2014 के चुनाव के दौरान बड़ी गहमागहमी थी. देश में चुनाव प्रचार सामग्री का सबसे बड़ा कारोबारी केंद्र है दिल्ली का सदर बाजार. बीते आम चुनाव के दौरान यहां करोड़ों का कारोबार हुआ. मगर इस बार यहां सन्नाटा है. आखिर राज क्या है. ऐसा नहीं है कि पिछली बार के मुकाबले इस कोई सस्ता चुनाव हो रहा है. बल्कि उल्टे इस बार पिछले चुनाव के मुकाबले लगभग 40 फीसदी अधिक खर्च होने का अनुमान है.

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चुनाव महंगा, सोशल मीडिया पर खर्च ज्यादा

दुनिया का सबसे महंगा चुनाव हो रहा है भारत में. मोटे तौर पर अनुमान है कि इसमें 50,000 करोड़ से ज्यादा खर्च होने का अनुमान है. फिर चुनावी प्रचार सामग्री बेचने वालों की दुनिया सूनी क्यों है? विज्ञापन से जुड़ी एजेंसियों के मुताबिक इस चुनाव में प्रचार के लिए राजनीतिक दलों और नेताओं द्वारा करीब 3,000 करोड़ रुपये खर्च किए जाने का अनुमान है. इसमें सोशल मीडिया की हिस्सेदारी करीब 500 करोड़ रुपये की है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार 1952 में हुए पहले आम चुनाव का खर्च 10 करोड़ से भी कम आया था. यानी प्रति मतदाता पर करीब 60 पैसे का खर्च. यह ठीक है कि उस समय यह रकम मामूली नहीं थी. लेकिन गैर-सरकारी आंकड़ों के मुताबिक आज विभिन्न दलों की ओर से 50-55 करोड़ रुपए मात्र एक संसदीय सीट में बहा दिए जाते हैं. शुरुआती दो-तीन आम चुनावों तक दिग्गज उम्मीदवार भी बैलगाड़ियों, साइकलों, ट्रकों पर प्रचार करते देखे जा सकते थे. फटेहाल नेताजी की आर्थिक मदद खुद कार्यकर्ता किया करते थे. लेकिन आज के नेता हेलीकॉप्टरों या निजी विमानों से सीधे रैलियों में उतरते हैं और करोड़ों रुपये खर्च करके लाखों लोगों की भीड़ जुटाते हैं.

कॉरपोरेट फंडिग बीजेपी पर मेहरबान

इस बार लोकसभा चुनाव में कॉरपोरेट फंडिंग का बड़ा हिस्सा भाजपा के हाथ लगा है. बचा खुचा कांग्रेस को भी मिला. इनके मुकाबले क्षेत्रीय पार्टियों के चुनाव प्रचार रईसी नदारद है. जाहिर है पैसा सर चढ़ कर बोल रहा है. हां इस बार पारंपरिक तौर तरीकों की बजाय राजनीतिक पार्टियां और चुनावी प्रत्याशई सोशल मीडिया पर ज्यादा भरोसा कर रहे हैं.

पहले तीन आम चुनावों को कराने में 10 करोड़ रुपये के बराबर या उससे कम खर्च हुआ था. 1984-85 में आठवें आम चुनाव तक यह खर्च 100 करोड़ रुपये से कम था. 1996 में 11वें आम चुनाव के दौरान यह पहली बार 500 करोड़ रुपये को पार कर गया. 2004 में 14वें आम चुनाव के दौरान 1,000 करोड़ रुपये से अधिक हो गया. 2014 के आखिरी लोकसभा चुनावों में 3,870 करोड़ रुपये का खर्च हुआ. 2014 में 2009 से यानी 15वें आम चुनाव के लिए किए गए खर्च से तीन गुना ज्यादा था

फेसबुक की तरफ से जारी आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, तीसरे चरण तक चुनाव प्रचार के मकसद से भाजपा ने कुल 1.32 करोड़ रुपये के 1,732 विज्ञापन जारी किए हैं. जबकि दूसरे चरण तक भाजपा ने कुल 87.47 लाख रुपये खर्च कर 1,129 विज्ञापन दिए थे. तीसरे चरण में सबसे ज्यादा 117 सीटों पर मतदान हुआ है. अगर भाजपा और उसके समर्थित पेजों को जोड़ दिया जाए तो विज्ञापन पर कुल खर्च 5.84 करोड़ रुपये पहुंच जाता है. भाजपा के मुकाबले कांग्रेस इस पर कम खर्च कर रही है. पिछले दो चरणों के आंकड़ों के मुताबिक, कांग्रेस ने फेसबुक पर 44.07 लाख रुपये के 1,205 विज्ञापनों दिए थे. तीसरे चरण तक यह आंकड़ा 55 लाख रहा. जिसके तहत कुल 2,202 विज्ञापन जारी किए गए. इनके अलावा फेसबुक के टॉप टेन विज्ञापनदाताओं की सूची में बीजू जनता दल के नेता नवीन पटनायक भी हैं.

फेसबुक को ज्यादा तवज्जो दे रही पार्टियां

ट्विटर और इंस्टाग्राम के मुकाबले फेसबुक लोगों का नजरिया बनाने में ज्यादा कारगर है. यही वजह है कि राजनीतिक दल भी अपनी बातों को लोगों के बीच पहुंचाने के लिए फेसबुक को ही ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं. फेसबुक को इस साल फरवरी से अब तक कुल 17.16 करोड़ रुपये के 84,368 विज्ञापन मिले हैं. इनमें से करीब 6 करोड़ रुपये के विज्ञापन सिर्फ भाजपा और उनके समर्थित पेजों के जरिए ही मिले हैं. जानकारों का मानना है कि पांचवे चरण के चुनाव तक लोकसभा की कुल सीटों में से आधे से ज्यादा पर मतदान संपन्न हो चुका है. ऐसे में बची हुई सीटों पर प्रचार के लिए राजनीतिक दलों के सोशल मीडिया कैंपेन में और तेजी आएगी. यानी फेसबुक और ट्विटर जैसे प्लेटफॉर्म पर दिए जाने विज्ञापनों की राशि बढ़ाई जानी तय है.

चुनाव मैनेजमेंट का दौर भी शुरु हो गया है

प्रशांत किशोर आज भी राजनीतिक विश्लेषकों के पोस्टर ब्वॉय हैं. उनके जैसे प्रोफेशन की संख्या तेजी से बढ़ रही है. इस क्षेत्र में कई नए नाम उभरकर सामने आए हैं. जिन्होंने इस उभरते हुए क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई है और अपने क्लांइट्स को जीत दिलाई है. एसोचैम के मुताबिक 2014 में भारत में करीब 150 राजनीतिक विश्लेषक थे. इंडस्ट्री से जुड़े लोगों का मानना है कि अब यह संख्या बढ़कर 300 हो गई है और लगातार बढ़ रही है. लोकसभा चुनाव के समर में उतर रहे उम्मीदवार जहां अर्जुन की आंख की तरह अपनी सीट पर नजरें गड़ाए वोटरों को लुभाने की हर संभव कोशिश में लगे हैं. वहीं इस दंगल में योद्धाओं का एक और दल भी है जो पर्दे के पीछे रहकर चुनावी आंकड़ों को खंगाल रहे हैं. इन योद्धाओं को हम कैम्पेन मैनेजर, राजनीतिक विश्लेषक, राजनीतिक सलाहकार, राजनीतिक रणनीतिकार और चुनाव प्रबंधक जैसे विभिन्न नामों से जाना जाता है.

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