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गंगा तेरा पानी…

गंगोत्री से लेकर गंगा सागर लाखों लोगों का पालती है मां गंगा…इसके साहिलों पर सभ्यताओं ने सांस ली और यहीं न जाने कितने लोगों को मोक्ष के लिए पंचतत्व में विलीन कर दिया गया. ये नदी नहीं है, ये मां हैं उन करोड़ो लोगों की, जो ये मानते हैं कि इसमें डुबकी लगाने से पाप धुलते हैं और इसके जल का आचमन कर लो तो प्राणों में सुख प्रभावित होने लगता है. मान्यता ये है कि गंगा का जन्म भगवान् विष्णु के पैरों से हुआ था. महाकाल की जटाओं में मां गंगा विराजती हैं. और उनके पूजन से दर्शन करने से पापों का नाश होता है, व्याधियों से मुक्ति होती है. जो तीर्थ गंगा किनारे बसे हैं वो पाक हैं. न जाने कितनी सभ्यताओं की जननी है गंगा, न जाने कितने लोगों का पेट भरने का साधन है गंगा, न जाने कितनी भाषाएं इसके किनारों पर आकर जीवंत होती हैं. करोड़ों लोगों को खलिहान इसके ऊपजाऊ मैदान देते हैं और सबसे बड़ी बात ये, कि गंगा से जुड़ी है करोड़ों लोगों की अटूट आस्था. लेकिन अब ये आस्था आह भर रही है कराह रही है और दम तोड़ती सांसों से मां गंगा कह रही हैं कि मुझे जीवन चाहिए.

व्याकुल क्यों हों ये संत, क्यों न गंगा की हालत पर ये रोएं, क्यों न सरकारों को ये संत नाकारा कहें. सरकारों ने अपनी अलसाए हुए सिस्टम से गंगा के साथ जो सलूक किया है उसके लिए न तो संत समाज सरकारों को माफ करेगा और न ही मां गंगा. क्यों गंगा के नाम पर वोट बटोरने के अलावा हिन्दुस्तान की सियासत ने कुछ नहीं किया. 80 के दशक से लेकर आजकल सियासतदानों से सिर्फ गंगा का जिक्र किया है. योजनाएं बनाई हैं. और ढोल पीटा है सफाई का. लेकिन विड़वना देखिए इतनी कोशिशों के बाद नतीजा ये हुआ है कि गंगाजल में ऑक्सीजन की मात्रा शून्य हो गई है. संतों ने दिसंबर 2012 में सरकार को अल्टीमेटम दिया था कि सरकार उन्हें जमीन दे क्योंकि वो जल समाधि नहीं भू समाधि लें. संतों ने कहा था कि वो कुंभ में स्नान नहीं करेंगे अगर गंगा साफ नहीं हुई. लेकिन इंतहाई बेशर्मी है कि दिसंबर 2019 आ गया लेकिन गंगा रत्ती भर भी साफ नहीं हुई. और हैरानी है इस बात की कि सरकार 2019 में प्रयागराज में अर्ध कुंभ की तैयारियां ऐसे कर रही है कि जैसे उसने कोई बड़ा तीर मार दिया हो.

ये माननीय कोर्ट और सरकारों की बातें हैं हमने नहीं कही हैं लेकिन हकीकत ये है कि न गंगा के लिए कुछ किया गया और उसकी सहायक नदियों के लिए, प्रयाग में जो यमुना गंगा में संगम करती है वो दिल्ली-हरियाणा का रास्ता तय करके नाला बन जाती है. लेकिन ऐसा क्यों है कि बीते तीन दशकों से भी ज्यादा समय में हजारों करोड़ रूपया गंगा सफाई के नाम पर बहा दिया गया लेकिन गंगा में बहते नालों को रोका नहीं जा सका. 2017 में आरटीआई के जरिए मिली सूचना बताती है कि

गंगा में करोड़ों लोग स्नान करते हैं. मलमूत्र त्यागते हैं फिर चांहे वो शौचालयों में ही हो, तो गंगा जल को स्नान व पीने के लिए और हानिकारक होने से कैसे रोका जाए ये भी सोचना जरूरी है. सिर्फ शौचालय बना देने भर से अगर गंगा साफ हो जाएंगी तो ये बड़ी भूल है. कैसे इतने लोगों के शौच और अपशिष्ट द्रव्यों को सीवेज प्रणाली झेल पाएगी. लेकिन हैरानी है इस ओर किसी का ध्यान नहीं है.

2019 के प्रयाग कुंभ में लगभग चौदह करोड़ श्रद्धालुओं मां गंगा में डुबकी लागएंगे इस उम्मीद के साथ कि उन्हें पापों से मुक्ति मिलेगी. लेकिन गंगा में इतनी गंदगी है कि आपका बीमार होना तय है. ठीठ हो चुका है ये सिस्टम, जिसे न तो इस बात से फर्क पड़ता है कि आप बीमार हो रहे हैं और ना इस बात से कि गंगा के लिए संत अपनी जान दे रहे हैं.

ये तो कुछ संतों की संख्या है, लंबी फेहरिस्त है ऐसे संतों कि जो अलग अलग स्तर पर अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं. लेकिन सुनवाई कहीं नहीं हो रही. गंगापुत्र जीडी अग्रवाल मोदी जी को चिठ्ठी लिख लिख स्वर्ग सिधार गए. किसी नहीं सुनी. लोग आंदोलन कर रहे हैं कोई नहीं सुन रहा है. हां हो ये रहा है कि संतों का अनशन तुड़वाने के लिए जबरन उन्हें जूस पिलाने नेता और डॉक्टर जरूर पहुंच जाते हैं.

क्या गंगा सफाई के नाम पर खानापूर्ति हो रही है ?

मोदी जी जब आए थे खूब सपने दिखाए थे लेकिन नमामि गंगे में जो पैसे आए वो सिर्फ सीवेज-ट्रीटमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर को तैयार करने में खर्च हो गए.

हकीकत देंखे तो ये साफ समझ आता है कि 2020 तक गंगा को साफ करने की मोदी सरकार की ये मुहिम ज़मीन पर फिसड्डी है और साल 2019 खत्म होने है, चुनाव है सरकार से कुछ होना जाना नहीं है. अङ जरा सोचिए. जिस बेटे को मां गंगा ने बुलाया था उसने गंगा सफाई के लिए जो परियोजना बनाई उसमें आवंटित बजट में से अभी तक सिर्फ एक चौथाई हिस्सा ही खर्च हो पाया है. सरकार ने 2015 में 20,000 करोड़ रुपये का बजट गंगा की सफाई के लिए पारित किया था. सिर्फ 4,800 करोड़ रुपये ही खर्च हो पाए हैं….ये हमारे आंकड़े नहीं हैं 14 दिसंबर, 2018 को लोकसभा में पेश डाटा के ये बताता है. चूक कहां हुई हैं. उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड सब जगह बीजेपी की सरकार है. क्योंकि जोरदार तरीके से काम नहीं हुआ. इन राज्यों के ज्यादातर शहरों नाले गंगा में गिरते हैं. और जिस दिशा में काम हो रहा है यानी ट्रीटमेंट प्लांट वहां भी अभी टारगेट पूरा नहीं हुआ है. इस क्षेत्र में निर्माण की बात करें तो अभी सिर्फ 11 फीसदी ही काम हो पाया है. काम की रफ्तार सुस्त क्यों है ? इस सवाल का जबाव देने वाला कोई नहीं.

लेट-लतीफी की वजह से गंगा सफाई की डेडलाइन 2020 कर दी गई

सौ दिन चले अढाई कोस वाली बात है. सरकारे आती हैं गंगा सफाई के लिए ठोस कदम उठाती हैं और चली जाती हैं लेकिन उठाए गए कदम इतने ठोस होते हैं कि वो आगे नहीं बढ़ पाते. और अब हालत की बात करें तो गंगा जल में बायोकेमिकल्स ऑक्सिजन डिमांड (बीओडी) का लेवल चिंताजनक है…बीओडी के बारे में आपको बता दें कि बीओडी पानी में ऑक्सिजन की मात्रा को निर्धारित करने का मानक है…शोध कहता है कि गंगा में प्रदूषण इस हद तक है कि पानी के भीतर ऑक्सिजन की मात्रा काफी कम हो चुकी है…केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने अपने ताजा अध्ययन में कहा है कि जिन 39 जगहों से होकर गंगा नदी गुजरती है उनमें से एक जगह पर इस साल मानसून के बाद गंगा का पानी साफ था. 39 में से सिर्फ एक जगह पर. ‘गंगा नदी जैविक जल गुणवत्ता आकलन (2017-18)’ की रिपोर्ट के अनुसार गंगा बहाव वाले 41 स्थानों में से करीब 37 पर इस वर्ष मानसून से पहले जल प्रदूषण मध्यम से गंभीर श्रेणी में रहा. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद सीपीसीबी ने ये रिपोर्ट जारी की थी. मानसून से पहले 41 में से केवल चार स्थानों पर पानी की गुणवत्ता साफ या मामूली प्रदूषित थी और मानसून के बाद 39 में से केवल एक स्थान पर. इसमें मानसून के बाद केवल ‘हरिद्वार’ में ही गंगा का पानी ‘साफ’ मिला…ये हाल है लेकिन बातें बड़ी बड़ी हो रही हैं. क्या बातें हो रही हैं. ये जरा देख लीजिए.

क्या कहती है सरकार ?

जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्री नितिन गडकरी इन तमाम आकंड़ों से इत्तेफाक नहीं रखते हैं. वो कहते हैं कि ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम के तहत गंगा नदी को निर्मल और अविरल बनाने की दिशा में तेजी से काम चल रहा है और उन्हें उम्मीद है कि मार्च 2019 तक 80 फीसदी और अगले मार्च तक गंगा पूरी तरह से निर्मल हो जाएगी…

आकंड़े बताते हैं कि गंगा को सबसे ज्यादा प्रदूषित उत्तर प्रदेश के कानपुर में होती है. यहां सीसामऊ नाले का रुख मोड़कर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की ओर ले जाने के बाद अब पूरे शहर में सीवरेज इन्फ्रास्ट्रक्चर स्थापित और परिचालन करने के लिए निजी क्षेत्र की एक कंपनी के साथ करार किया गया है…इस करार के बाद निजी क्षेत्र की कंपनियां ‘वन सिटी, वन ऑपरेटर’ के मॉडल पर कानपुर में एसटीपी का संचालन कर यह सुनिश्चित करेंगी कि शहर की गंदगी गंगा नदी में न गिरे…गंगा सफाई के लिए उठाए गए कदमों में राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी), यूपी जल निगम और निजी कंपनियों- शपूरजी पालोनजी एंड कंपनी लिमिटेड और एसएसजी इंफ्राटेक लिमिटेड काम करेंगी. कानपुर में हाइब्रिड एन्युटी मॉडल पर चलने वाली कानपुर परियोजना के तहत शुक्लागंज, पंखा और उन्नाव में तीन नए एसटीपी लगाए जाएंगे जबकि चार पुराने एसटीपी को सुधार कर चलाया जाएगा…शपूरजी पालोनजी एंड कंपनी लिमिटेड के अधिकारी रेबी थॉमस ने कहा कि अगले कुछ महीने में परियोजना पर काम शुरु हो जाएगा। इस परियोजना पर 817 करोड़ रुपये लागत आएगी…ये तो सरकारी बातें हैं. हकीकत देखिए

कहां होता है ज्यादा प्रदूषण ?

मोदी सरकार कितनी गंभीर है ?

अब जरा इन आंकड़ो पर गौर करिए मोदी सरकार आने के बाद जो पैसा स्वीकृत हुआ हुआ उसका आधा भी गंगा की सफाई पर खर्च नहीं किया जा सका. और गडकरी जी 2020 तक गंगा की पूर्ण सफाई का दावा कर रहे हैं. सवाल ये है कि इन दो सालों में कौन पैर निकल आए हैं सिस्टम के जो घोड़े की रफ्तार से ये दौड़ेगा.

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